सोमवार, 24 जनवरी 2011





अष्टावक्र


(लोकविख्यात बालयोगी अष्टावक्र के जीवन पर केन्द्रित नाटक)

दृश्यबन्ध-1
 (अष्टावक्र के पिता वैष्णव मतानुयायी आचार्य सुयश शर्मा विद्यापीठ के कुलपति है।लोकायत मत की अनुयायी सावित्री उनकी पत्नी,और अष्टावक्र उनका दो वर्षीय बेटा। आचार्य वैदिक कर्मकाण्ड के मार्ग पर चलते और सावित्री को वैदिक कर्मकाण्ड पर विश्वास नही था। जनकपुर की बस्ती से दूर प्राकृतिक वातावरण मे आचार्य सुयश का विद्यापीठ है। अष्टावक्र जन्म से ही शारीरिक रूप से अक्षम है। उसके शरीर की आठ हड्डियाँ टेढी थी इसीलिए पिता ने उसका नाम अष्टावक्र रख दिया था। इस दृश्य मे पति पत्नी दोनो अष्टावक्र को लेकर चिंतित हैं और एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं-)


                            एक:- उपेक्षित लाडला


सुयश- तूने किस मनहूस राक्षस को जन्म दिया-सावित्री! मेरा तो कुल ही कलंकित हो गया..तेरे आचार विचार..


सावित्री-मेरे आचार विचार के बारे मे कुछ कहा तो ठीक नही होगा --आचार्य.!...आप भी निरे पुरुष ही निकले....।


सुयश-तेरे आचार विचार शुद्ध होते तो ये नि:शक्त बालक जन्म नही लेता।


सावित्री-शिशु की निशक्तता की जिम्मेदारी केवल माता की नही होती,पिता की भागीदारी के बिना तो शिशु जन्म ही नही लेते..फिर केवल माता?


सुयश ये कैसी मूर्खतापूर्ण बाते कर रही हो?


सावित्री- सत्य तीखा होता है आचार्य! क्यो?..बुरा लगा आपको?..


सुयश-और क्या..मेरे आचार विचार के बारे मे तो पूरा जनकपुर जानता है। मै शुद्ध वैष्णव मत का अनुयायी हूँ -त्रिकाल सन्ध्या करता हूँ।


सावित्री-मै लोकायत मत की हूँ-इसीलिए मेरे आचार विचार आपको शुद्ध नही लगते?


सुयश-चार्वाक के अनुयायी ...और आचार विचार की शुद्धता?..ह.ह.ह ...यदि तुम भी वैष्णवी होतीं..तो ये मनहूस नि:शक्त बालक ...



सावित्री:-फिर क्यों किया था प्रेम मुझसे ?..और क्यो किया था विवाह ?...


सुयश :-बस यही भूल हुई...और अब उसी का परिणाम है ये मनहूस राक्षस...


सावित्री-मेरा अष्टावक्र नि:शक्त है,मनहूस नही..वह राक्षस नही है और अपंगता कोई अभिशाप भी नही है।..इसका मस्तिष्क सक्रिय है। आप देखना एक दिन यही नि:शक्त बालक अपने कर्मो से हमे ख्याति दिलायेगा,यह एक माता का विश्वास है।


सुयश ;- पता नही तुम क्या सोचती हो ..


सावित्री;- जो मै सोचती हूँ वही ठीक है पुत्र के बारे मे माता से अच्छा और कौन सोच सकता है?..और हाँ देखो अभी मै स्नान सरोवर तक जा रही हूँ...


सुयश:- तो जाओ, मैने कब रोका है?..


सावित्री:- तनिक ध्यान रखना मेरा लाडला यहाँ सो रहा है..कहीं खटोले से नीचे न गिर जाये...सुमित्रा भी नही है घर में...


सुयश:-ठीक है...(अपवार्य)अब मेरे लिए यही रह गया है कि इस कुलकलंकी अपाहिज की देखभाल करूँ ?..मै भी कितना अभागा हूँ!..इस प्रौढावस्था मे पुत्र हुआ वह भी नि:शक्त..अब तो इसकी ही देखरेख मे शेष जीवन कट जायेगा। विद्यापीठ का विकास गया भाड मे।
(पत्नी के जाने के बाद आचार्य सुयश ने शिशु को खटोले से नीचे लिटा दिया और यू ही एकांत मे आकाश की ओर देखकर कुछ चिंतन करने लगे। उनकी चिंता धीरे धीरे अब कुंठा मे बदलने लगी थी। देर तक आँगन मे वैसे ही बैठे रहे ।इस बीच सावित्री स्नान सरोवर से स्नान करके वापस आयी तो वह हैरान रह गयी।)


सावित्री:-अरे यह खटोले से नीचे कैसे आया?


सुयश:-..मैने ही धरती पर लिटा दिया था।


सावित्री:-क्यो आचार्य?


सुयश:-ताकि यह नीचे न गिर जाये..


सावित्री:- कोई जीव काट लेता मेरे लाल को तो?


सुयश:-कुछ हुआ तो नही...


सावित्री:-आपने इसके आँसू देखे?


सुयश:-मुझे तो रोने की भी आवाज सुनाई नही दी..


सावित्री:-ये चीखता नही है...किंतु जब कष्ट असहनीय हो जाता है तो इसकी आँखों से आँसू निकल आते हैं..अरे इसके पैर मे तो चींटे चिपके हैं..अरे देखो तो खून भी निकल रहा है आप कितने निर्दयी हैं?


सुयश:- इस अपाहिज को लेकर मेरा समय नष्ट मत करो..मुझे विद्यापीठ के और भी काम हैं..


सावित्री:-देखना एक दिन यही काम आयेगा!,तनिक बडा होने दो..


सुयश:-बडा भी हो जायेगा तो क्या कर लेगा ? विद्यापीठ के अन्य विद्यार्थियों की तुलना में ?..देवदत्त की तरह क्या यह पेड पर चढकर यज्ञ के लिए लकडियाँ तोड लायेगा ?


सावित्री:-नही ये लकडहारा नही है,ये तो विलक्षण है,देखना ये यज्ञ अनुष्ठान करेगा ही नही-ये उपदेशक बनेगा..


सुयश:-उपदेशक क्या बनेगा ये मिट्टी का माधव..अभी तो बोल भी नही पाता


सावित्री:-माता कहने लगा है..


सुयश:-तात तो नही कह पाता..क्या करेगा?...अरे ये तो सोम शर्मा की तरह गोदोहन भी नही कर पायेगा?


सावित्री:-आपको तो सारी कमियाँ मेरे बेटे मे ही दिखायी देती हैं...तनिक बडा होने दो देखते रह जायेंगे आप और आपके विद्यापीठ के सभी शिष्य।

(अष्टावक्र का स्वभाव अंतर्मुखी था। माता के अलावा सुमित्रा बुआ ही उसका ध्यान रखती थीं। धीरे धीरे अब अष्टावक्र बडा हो आया था)


क्रमश:

4 टिप्‍पणियां:

  1. श्रेष्ठ नाट्य प्रसंग..! ...!मैंने ''अष्टावक्र गीता ''(हिंदी अनुवाद -अनुवादक श्री नन्द लाल दशोरा )पढ़ा है!...अद्वितीय ....!वस्तुतः,अष्टावक्र का सारा उपदेश बोध का है !ज्ञान प्राप्ति के लिए मात्र उपदेश इतना ही था .की ""आत्म ज्ञान के लिए कुछ करना नहीं है,क्यूँ की क्रिया केवल बंधन है !इनके साथ अपेक्षाएं और फल की आकांक्षाएं जुडी रहती हैं !जीवन समस्या नहीं है,किन्तु मनुष्य के गलत द्रष्टि कोण ने ही उसे समस्या बना दिया है!""...बहुत प्रासंगिक और सरल व्याख्या! ये भी कहा जाता है की विवेकानंद अष्टावक्र गीता पढ़ते पढ़ते ही ध्यानस्थ हो गए थे ,व् उनके जीवन में क्रांति घट गई !..धन्यवाद भारतेंदु जी इस सुन्दर प्रसंग के लिए !

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  2. बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर नई पोस्ट देखकर अच्छा लगा। 'अष्ठवक्र' में एक कौतुहल छिपा लगा, आगे क्या होगा? वाला… नाटक का यह अंश बांधता है…

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  3. आचार्य सुयश वैदिक कर्मकाण्ड का अनुसरण करते किंतु सावित्री को वैदिक कर्मकाण्ड पर विश्वास नहीं था--वस्तुत: इस द्वैत से ही अष्टावक्र का जन्म हुआ, ऐसा मेरा मानना है। मेरे अध्ययन के अनुसार--तत्कालीन समाज में योग के आठ अंगों की विक्षिप्त और रूढ़ हो चुकी परम्परा के विरोधस्वरूप ही 'अष्टावक्र' की अवधारणा ने जन्म लिया। आपने विषय को स्वाभाविक संवादो से आगे बढ़ाया है। जिज्ञासा बनती है कि आगामी कड़ी में क्या होने वाला है!

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  4. भटकता हुआ आया था ,किन्तु भटका हुआ नहीं रहा|नाट्य-सम्पदा मिली-वह भी अष्टावक्र केंद्रित |
    सुखी अनुभव कर रहा हूँ , और अगली कड़ियों की प्रतीक्षा भी --उत्सुकता सहित |

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