रविवार, 13 अगस्त 2017

पुस्तक समीक्षा
नाटकों से पाठ्यचर्या को बेहतर बनाया जा सकता है
डॉ॰ भारतेंदु मिश्र
बच्चों को सिखाने के लिए नाटक एक सशक्त माध्यम है। आधुनिक समय में अधिकांश विद्यालयों में रचनात्मक शिक्षक इस विधा को अपनी पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाने लगे हैं। प्रसंगवश अभी कथाकार बलराम अग्रवाल के 15 ऐसे ही छात्रोपयोगी नाटकों की पुस्तक ‘आधुनिक बाल नाटक’ शीर्षक से प्रकाश में आई है। लघुकथा के क्षेत्र में बलराम अग्रवाल एक बड़ा नाम है। इसके साथ ही बाल साहित्य के क्षेत्र में उनका काम लगातार पढ़ा सराहा जाता रहा है। इस संग्रह में संकलित कई नाटक अनेक प्रदेशों की पाठशालाओं के पाठ्यक्रमों में भी शामिल किये जा चुके हैं। जैसाकि ‘अपनी बात’ में लेखक ने स्पष्ट किया है—इस पुस्तक में संकलित नाटक ‘जरूरी खुराक’ को केरल शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा 7 में, ‘पेड़ बोलता है’ को हिमाचल शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा 4 में और ‘सूरज का इंतज़ार’ मुम्बई की शिक्षण संस्थाओं द्वारा कक्षा 6 में पढ़ाया जा रहा है। पढ़ाया जा रहा है।
बलराम अग्रवाल अनेक वर्ष रंगमंच पर सक्रिय रहे हैं। अत; माना जा सकता है कि उन्हें नाटक की मूलभूत आवश्यकताओं की समझ है। उन्होंने इन नाटकों को बालमनोविज्ञान की अपनी समझ के आधार पर रचा है। इनमें वर्णित प्रसंगों और दृश्यबंधों को लेखक ने जीवन के दैनन्दिन आयामों से चुना है। ये नाटक यथार्थ जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी देने वाले भी हैं और खेल-खेल में बच्चों को जीवन की सीख भी दे जाते हैं। बच्चों के लिए इन नाटकों का बड़ा महत्व है। इस पुस्तक में कुल 15 बाल नाटक संग्रहीत हैं जिन्हें एकांकी और नुक्कड़ के शिल्प में लिखा गया है। इसके साथ ही इन्हें तीन खंडों में विभाजित भी किया गया है। पहले खंड में जीवन के प्रेरक प्रसंगों पर आधारित पाँच नाटक हैं जिनमे  क्रमश: ‘अपना सुल्लू’, ‘जरूरी खुराक’, ‘चमत्कारी छडी’, ‘होई हो हे हे’, ‘लुटेरे राम नाम के’ शामिल हैं। दूसरे खंड में चार नाटक महात्मा गांधी जी  के जीवन के प्रसंगों पर आधारित हैं, जिनके शीर्षक  हैं—‘मोहनदास का साहस’, ‘पश्चात्ताप के आँसू’, ‘सूरज का इंतजार’ और ‘मालिक मजदूर और नेता’। इसी खंड में एक नाटक नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवन की घटना पर भी केन्द्रित है जिसका शीर्षक है—‘आजादी के दीवाने’। तीसरे खंड में पर्यावरण संरक्षण तथा वृक्षों की उपयोगिता पर केन्द्रित पाँच नाटक हैं, जिनका शीर्षक है—‘पेड़ बोलता है’, ‘पीपल बोलता है’, ‘नीम बोलता है’, ‘बेल बोलता है’ तथा ‘पेड़ बचेगा तभी बचेंगे’।
इन नाटकों की विशेषता यह है कि ये सहजता से बच्चों को उनकी अपनी सरल भाषा में समझ में आने वाले हैं। अध्यापकों द्वारा बिना किसी बड़े इंतजाम के इन्हें विद्यालय स्तर पर खेलाया जा सकता है। जीवन और शिक्षा को जोड़ने के लिए नाटक बेहतरीन प्रयोग तो होता ही है। आधुनिक शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि नाटकों के माध्यम से पाठ्यचर्या को बेहतर बनाया जा सकता है। आशा है पुस्तक में संग्रहीत इन नाटकों से भाई बलराम अग्रवाल को यश मिलेगा और शिक्षा जगत में इस पुस्तक समुचित आदर होगा। लेखक को बधाई।
पुस्तक : आधुनिक बाल नाटक लेखक : बलराम अग्रवाल प्रकाशक : राही प्रकाशन, ए-45, गली नं 5, करतार नगर, दिल्ली-110053 प्रथम संस्करण : 2017 मूल्य : 200 रुपये
समीक्षक संपर्क : डॉ॰ भारतेंदु मिश्र, सी-45/वाई-4 ,दिलशाद गार्डन,दिल्ली-110095
फोन-9868031384 ई-मेल—b.mishra59@gmail.com


शुक्रवार, 16 जून 2017

                      भारतीय कला एवं राष्ट्रीयता
                     (व्याख्यान/दिनांक -16/6/2017)
                            #भारतेंदु मिश्र :

कला चेतना का संबंध हमारी सभ्यता के उद्गम से ही जुडा हुआ है| इसमें स्त्री और पुरुष की सामान रूप से भागीदारी की कल्पना की गयी है| कलाएं हमारी संस्कृति का अंग हैं-जिसमें आदिदेव महादेव की कल्पना की गयी है वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक और पूरब से सुदूर पश्चिमी तट तक फ़ैली हुई है|ये शिवालय,जो कि हर एक गाँव –कस्बा या कि शहर में पाए जाते हैं ये हमारी भारतीय कलाओं की चेतना का मूल प्रतीक चिन्ह है|इन शिवालयो में  वास्तु है, मूर्ति है, चित्र है,संगीत और नृत्य है|ये शिवालय ही शिव आराधन की परंपरा में हमारी कलाओं के आदि केंद्र के रूप में विक्सित हुए| कालिदास की चेतना में शिव और पार्वती-‘वागार्थ इव संपृक्तौ’ –अर्थात वाणी और अर्थ के सामान जुड़े हुए हैं| वही तो अर्धनारीश्वर हैं जिनकी कल्पना दुनिया की किसी अन्य सभ्यता में शायद ही की गयी हो | यहाँ स्त्री और पुरुष मिलकर सामान भागीदारी से नई मनुष्यता का ही सृजन नहीं करते बल्कि अपने जीवन निर्वाह के साथ ही नवोन्मेषशालिनी कलाओं का भी सृजन करते है|जब शिव तांडव करते है तब पार्वती लास्य करती हैं|-
नृत्यावसाने नटराज राजा ननाद ढक्कां नवपंचाबारं
उद्धर्तुकामा सनाकादिसिद्धे:एतद्विमर्शे शिवसूत्र जालम|
अर्थात जब शिव का तांडव नृत्य हुआ तो शिव के डमरू का स्वर ब्रम्हांड के चौदहों भुवनो में व्याप्त हुआ और उसी परिवर्तन के क्षण में 14 माहेश्वर सूत्र निकले जिन्हें लेकर पाणिनि ने ‘अष्टाध्यायी’ जैसे व्याकरण के ग्रन्थ की रचना की,जो कालान्तर में  व्याकरण भाषा और काव्य नाट्य आदि कलाओं का उद्गम बने| इसी प्रकार जब देवी पार्वती का लास्य हुआ तो सरगम निकले जिससे संगीत और नृत्य जैसी कलाओं की चेतना विकसित हुई|ऐसा हमारे पारंपरिक चिंतको का मानना है| परा वैदिक युग में कलाओं और कलाकारों को पूर्ण स्वतंत्रता थी ,कालान्तर में बौद्ध दर्शन के प्रभाव स्वरूप मूर्तिकला,वास्तुकला और चित्र कला –स्वास्तिक,शंख,मंगल कलश आदि के रूप में जहां विक्सित हुई, वहीं संगीत,नृत्य,नाटक आदि का ह्रास हुआ|संगीत ,नृत्य, नाटक आदि का विकास विक्रमादित्य और कालिदास के समय से पुन: आरम्भ हुआ|भारतीय कला चेतना वस्तुत: प्रकृति रूपा है|सूर्य निकलता है तो उसकी रश्मियों से इन्द्रधनुष निर्मित हो जाता है|आदिम काल से ऐसा ही होता आ रहा है|उस इन्द्रधनुष की लय-लोच और रंगों के अनुपात का संयोजन प्रकृति ही करती है|पुरुष और प्रकृति दो ही तो मूल तत्व हैं-इस धरती के|वे ही तो आदि कारण है –इस सृष्टि के| समुद्र का अनहद राग,पर्वतो से फिसलकर निकलने वाली नदियों की कलकल ध्वनि ,स्त्री पुरुषो के नाना रूपाकार उनके विविध आचार व्यवहार आदि सब मूलत: प्रकृति का ही पर्याय है|यह सब



समानांतर सृजन सूक्षम पुरुष और मूल प्रकृति के आनंद का हेतु है| वह आनंद ही भारतीय कला चेतना का उत्स है| वही जो सत्य के रूप में प्रतिष्ठित है ,वही जो शिव है -वही जो सुन्दर है| हम सबका जीवन सौन्दर्य की यात्रा भर है|इस जीवन यात्रा में कौन किस पद्धति से जाता है ,किस माध्यम को चुनता है,कितना समय लगाता है,किस दिशा में जाता है, यह कलाओ के रूपाकारो और कलाकारों की रुचियों पर निर्भर करता है| कला का उद्देश्य ही आनंद प्रदान करना है-‘कम लाति या सा कला’ कला शब्द की निरुक्ति से हमे अर्थ प्राप्त होता है कि-‘जो आनंद प्रदान करे वही कला है’| आनंद या आत्मिक सुख का ही एक स्वरूप है किन्तु कला चेतना के आधार पर सहृदयो ने काव्यकला  के आनंद को काव्यानंद कहा और संगीत और नृत्य के आनंद को नादानंद कहा| तुलनात्मक सौन्दर्य दर्शन की बात करें तो कला समीक्षकों ने – संगीत और नृत्य के लिए -नाद ब्रम्ह,काव्य और अभिनय के लिए-रस ब्रम्ह ,स्थापत्य  वास्तु आदि के लिए -वास्तु ब्रम्ह जैसी कल्पना की है|अर्थात विभिन्न कलाओं के प्रयोजन को ब्रम्हानंद से जोड़ा गया है|यह अनिर्वचनीय आनंद ही हम कलाओं से गृहण करते हैं|ये कलाए ही हमारे जीवन की अभिरुचियो को संस्कारित भी करती है| ये रस तो ब्रम्हानंद सहोदर है| अग्निपुराण में कहा गया-‘रसो वै स:’ अर्थात वो रस ही ब्रम्ह  है|इसीलिए हमारी प्राचीन शिक्षा को इस आनंद के मार्ग से जोड़ा गया है|कलाए मनुष्य को संस्कारित करती है|कुछ तो ललित कलाए है जैसे –अभिनय,काव्य,संगीत,नृत्य,वास्तु,चित्र और मूर्तिकला|दूसरी  अन्य उपयोगी कलाए-और शिल्प जैसे –काष्ठ शिल्प,लौह शिल्प,माली,मुकुटकार ,स्वर्णकार,वस्त्रकार ,कारूक (रथ बनाने वाले)आदि|सहस्रों वर्षो से ये कलाएं हमारे बृहत्तर भारतीय समाज में व्यवसाय के रूप में व्याप्त रही हैं|जन रूचि के आधार पर उनके रूप और उपयोगिता में बदलाव आता रहा | परन्तु ललित कलाए राज्याश्रय के कारण अपने मूल स्वरूप के निकट ही रहीं| इतिहास में अनेक ऐसे अवसर आये जब कलाओं को राजसत्ता से उपेक्षा और तिरस्कार भी मिला |लेकिन कलाकारों ने सत्ता की उपेक्षा के कारण कष्ट सह कर भी अपनी जीवन शैली नहीं बदली|दूसरी ओर राज्याश्रय स्वीकार करने वाले -कवि ,वास्तुकार,रंगकर्मी/नृत्यांगना ,चित्रकार, संगीतकार आदि के बारे में हम जानते है कि इन कलाकारों की उपस्थिति ज्यादातर  राजाओं /सामंतो और नवाबो के यहाँ हमें इतिहास में देखने को मिलती है|उन पर सत्ता का अंकुश भी रहा|भारत में जब कभी शासन की निरंकुशता का वातावरण समाज में बना तो –काव्य,नाट्य,संगीत,वास्तु,मूर्ति,चित्र स्थापत्य जैसी  कलाओं को एक समय में मंदिरों और शिवालयों मे स्थान मिला |दूसरी ओर स्तूपों ,गिरिजाघरो, मस्जिदों और मकबरों जैसी जगहों में संगीत के अलावा वास्तु,स्थापत्य,चित्र जैसी कलाओं को स्थान मिला|इसके अलावा हमारे समाज में उपयोगी कलाओं और शिल्पों को जनता ने अपनी जीवनचर्या का हिस्सा बना लिया, इस कारण ये कलाएं लोक व्यापी हुई और कलाकार की जातियों में बदलती चली गयीं|अर्थात किसी कला व्यवसाय को लगातार अपनाने के कारण ही बढ़ई,लुहार,सुनार,जुलाहा,कुम्हार जैसी जातियां बनती चली गयी|आज भी हम अपने भारतीय समाज में इन विभिन्न कलाकारों की जातियों को देख रहे हैं लेकिन आज उनकी स्थिति पहले से भिन्न है|आज कई स्तरों पर ये कलाकारों की जातियां समाज की मुख्यधारा से कट गयीं हैं और पिछड़ गयीं हैं |हमें इनके जातीय कौशल को पहचानकर इन्हें अपनी कलात्मकता को जीवित रखने के समुचित अवसर प्रदान करने होंगे| हमारा देश ललित कला और उपयोगी कला दोनों कला रूपों से संपन्न रहा है| ‘नाट्यशास्त्र,मानसारवास्तुशास्त्र तथा शुक्रनीतिशास्त्र’  जैसे ग्रंथों में प्राचीन कलाओं की लम्बी सूची दी गयी है|जिनके भेदोपभेद मिलाकर कलाओं की संख्या सहस्रों में पहुँच जाती है|प्राचीन काल में कला को पुरुषार्थ का साधन भी माना गया अर्थात कला साधना द्वारा-धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थ को भी अर्जित किया जा सकता है| यद्यपि चाणक्य जैसे चिन्तक की राय इससे भिन्न है|उधर यूनानी विचारक प्लेटो ने भी कला को भ्रम ही माना है| हमारे प्राचीन विचारको ने कभी भोगवाद को बढाने वाली कलाओं को कला नहीं माना|उनकी मान्यता थी कि वही कला श्रेष्ठ है जिसके माध्यम से आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है –
विश्रान्तिर्यस्या संभोगे सा कला न कला मता
लीयते परमानंदे ययात्मा सा परा कला|
कालिदास अपने नाटक मालविकाग्निमित्रम (1/4 ) में नाटक को चाक्षुषक्रतु कहते हैं|  
नाटक प्रेक्षकवर्ग को आह्लादित करनेवाला मनोरम अनुसंधान है| यह जातिभेद ,वर्गभेद, वयोभेद,लिंगभेद  आदि नैसर्गिक एवं सामाजिक विभेदों से निरपेक्षभिन्न रुचि की जनता का सामान्य रूप से समाराधन करनेवाला एक कांत, 'चाक्षुषक्रतुहै।क्योकि नाटक समस्त कलाओं के समावेश और समायोजन से ही खेला जाता है|इसी लिए ‘नाट्यशास्त्र’ को समस्त कलाओं का कोश और पंचम वेद कहा गया है|सभी कलाओं में रस की चेतना ही आनंद का मूल है|
जहां तक हमारी राष्ट्रीयता का प्रश्न है तो हमारे वैदिक ऋषियों ने हमे केवल भारत के भूभाग ही नहीं वरन पूरे विश्व की नागरिकता दी है| पृथ्वी सूक्त का ऋषि कहता है-‘माता भूमि: पुत्रोडहम पृथिव्या:’ अर्थात ये समस्त धरती हमारी है और हम इसके पुत्र हैं| स्वतंत्रता के बाद देश का भूगोल बदला है,इतिहास  नहीं,आजादी के बाद से राष्ट्रीयता का प्रश्न जोर शोर से उठाया जाने लगा| बाद में हमारी राष्ट्रीयता का निर्धारण –भूभाग ,जनता और संस्कृति से किया जाने लगा | इस देश विभाजन के बावजूद हमारी सनातन संस्कृति अविच्छिन्न रही| भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखने वाले जो 6 प्रमुख कारक हैं वे क्रमश:-धर्म,दर्शन,इतिहास,कला,ज्योतिष और साहित्य हैं| धर्म का अर्थ-सनातन धर्म जिसमे किसी पंथ की बात नहीं की गयी --धृति;क्षमा दमो अस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं |
दर्शन का अर्थ-आस्तिक और नास्तिक भारतीय दर्शन परंपरा जिसमे-चार्वाक,जैन,बौद्ध,को नास्तिक माना गया जबकि-योग,सांख्य,न्याय,वैशेषिक,वेदान्त आदि को आस्तिक दर्शन माना गया|वेदान्त और सांख्य दर्शन की ही एक विकसित परंपरा में कश्मीर के दार्शनिको ने कश्मीर शैव दर्शन की परंपरा को विक्सित किया जिसे दसवी शताब्दी में आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने भारतीय सौन्दर्य चेतना और स्वतन्त्रकालाशास्त्र के रूप में विक्सित किया| गत वर्ष ही हमने  आचार्य अभिनवगुप्त की जन्म सहस्राब्दी भी मनायी है| किसी समूह या समाज की दार्शनिक पृष्ठ भूमि कोई भी हो मतभेदों के बावजूद हम सह अस्तित्व में ही विश्वास करते हैं|
इतिहास का अर्थ है-रामायण,महाभारत,पुराण आदि|
ज्योतिष का अर्थ है-गणित,मौसम विज्ञान,पंचांग आदि|
साहित्य में –कालिदास आदि से लेकर आज तक जो कुछ उल्लेखनीय लिखा पढ़ा गया|
अत: जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो हमें संस्कृति के इन सभी आयामों पर विचार करना होता है|अर्थात हमारी कलाए हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं| आज भी ये कलाकार ही संपूर्ण जातीयता के साथ हमारी राष्ट्रीयता में शामिल हैं और ये कलाए ही हमारी राष्ट्रीय चेतना का मुख भी हैं|वो संगीत के क्षेत्र में मोहिउद्दीन डागर,बड़े गुलाम अली खा,भीमसेन जोशी,हरिप्रसाद चौरसिया,गिरिजादेवी,भूपेन हजारिका, लतामंगेशकर जी या लोक गायन में तीजनबाई  और आदरणीया मालिनी जी ही क्यों न हो-सभी कलाकार मानवीय सुख की व्याख्या करते आये हैं| चित्रकला और पेंटिंग के क्षेत्र में देखते हैं तो टैगोर बंधुओ के अलावा अमृता शेरगिल,राजा रविवर्मा,जतिन दास,शुभा मुद्गल जैसे अनेक नाम उल्लेखनीय है|वास्तु के क्षेत्र में बात करें तो हम ताजमहल की सुन्दरता को अपनी राष्ट्रीय चेतना से जोड़े बिना कैसे रह सकते हैं|दक्षिण के मंदिरों का वास्तु हमारी राष्ट्रीय चेतना का ही प्रतीक है|आज हम जिस दिल्ली में बैठे हैं उसमें  हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुकार की भावना निर्माण कला को कैसे भूल सकते है जिसने संसद भवन,राष्ट्रपति भवन जैसे भवन हमारे लिए निर्मित किये|मूर्तिकला के क्षेत्र मे अजन्ता एलोरा की गुफाओं की कृतियों से लेकर खजुराहो आदि की मूर्तियों के सौन्दर्य और उनके राष्ट्रीय महत्त्व को कैसे विस्मृत कर सकते हैं| कर्नाटक के जनकाचार्य जैसे अमर शिल्पी की कथा आज दक्षिण में किंवदंती के रूप में प्रचलित है|इसी सन्दर्भ में रामकिंकर वैज ,देवीप्रसाद राय चौधरी, शंखो चौधरी,धनराज भगत,मीरा मुखर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं| उड़ीसा के सुदर्शन पटनायक जिन्होंने समुद्र की रेत को अपना माध्यम बनाया|उनकी राष्ट्रीय चेतना पर प्रश्नचिन्ह कौन लगा सकता है| इसी प्रकार नृत्य के क्षेत्र में मल्लिका साराभाई,प.बिरजू महाराज,शोभना नारायण,उदयशंकर जी,सोनल मानसिंह आदि का नाम उल्लेखनीय है|इनके जैसे विभिन्न  कलाकार अन्यान्य कला क्षेत्रो में काम करते हुए हमारी राष्ट्रीयता के गौरव को ही नहीं अपितु  भारतीय कला वैभव को विश्वव्यापी बना कर हमारी सामासिकता को समृद्ध करने में लगे हैं|ये सभी कलाकार किसी एक जाति या पंथ के लिए काम नहीं करते वरन इनका लक्ष्य अकुंठ भाव से संपूर्ण मानवता को आह्लादित करना है|इनकी राष्ट्रीयता समग्र मानवता को समर्पित है|इनका लक्ष्य-संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसि जानताम- है| सत्ता की भाषा और विपक्ष की भाषा से ऊपर उठकर ये कलाकार संवेदनाओं की भाषा जानते है|सच्चा कलाकार समावेशी होता है,वह अपनी साधना को एकांगी नहीं रख सकता| इसके अलावा जो एक पक्ष या एक विचार लेकर चलते हैं,उनकी कुंठित मानसिकता से उपजी रचनाओं या कलाकृतियों का न तो समाज हित में कोई उपयोग होता है न राष्ट्र हित में|सच्चे साधक कलाकार समष्टि की संवेदनाओं की चिंता करते हैं, वैचारिक स्तर पर वैश्विक होते है| मुझे लगता है इन कलाओं का स्वरूप पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय है इनमे राष्ट्रीयता खोजना इन्हें संकुचित करना होगा|शिव का अर्थ है कल्याण की भावना भारतीय कलाकार सत्यं शिवं सुन्दरम का लक्ष्य लेकर जीवन और जगत की अनंत यात्रा पर निकलता है| यश,अर्थ और परमार्थ के साथ ही ये कलाकार अपने कलाकर्म से भारतीय राष्ट्रीय गौरव को सदैव बढाते रहे हैं|आधुनिक समावेशी जीवन शैली के कारण अब तकनीकि के रथ पर सवार होकर हमारी कलाए विश्व भ्रमण कर रही हैं| आज हमारे समाज में पारंपरिक लोक कलाओं का महत्व बढ़ा है| रंगोली हो या फुलकारी कला सब हमारे जीवन का अंग बन गयी हैं- डा.वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार-“‘कांगड़ा के लोटे,बुंदेलखंड के चम्मू,गुजरात के रामणदीप,घरेलू झूले,पूजा के पंचपात्र,बिच्छू,मछली,सिह,आदि आकृतियों के ताले,नर नारी मिलन के आकार वाले सरौते,पंजाब की फुलकारी,कच्छ के वस्त्रो पर कांच के चांदो की टंकाई,चंदेरी साड़ियो के दिपदिपाते झलाबोर के चौड़े पल्ले ,गुजराती पटोले,राजस्थानी बांधनू,बंगाल के बलूचर की रेशमी साड़ियाँ –इस प्रकार की अनगिनत वस्तुए युग युग से कला क्षेत्र में विक्सित होकर मानवीय जीवन को सुन्दरता प्रदान करती रही हैं|” (पृष्ठ-228- कला और संस्कृति ) आज के कलाकारों को उनकी कला का समुचित मूल्य मिले ऐसी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए| जैसे जैसे हमारे कलाकारों का विकास होगा हमारी राष्ट्रीयता और हमारी संस्कृति दुनिया में आगे बढ़ती रहेगी| हालांकि कुछ प्रगतिशील कलाकारों को अपने कौशल का उचित यश और मूल्य भी मिल रहा है|फिर भी अभी बहुत से साधक यथोचित अवसरों से वंचित हैं| कलाओं के विकास से ही हमारे देश की समावेशी जीवन शैली का विकास संभव है| अंतत: हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि हम अपने कलाकारों को सम्मान सहित कला साधना के अवसर प्रदान करें|जहां आवश्यक हो उन्हें अपेक्षित संरक्षण भी दें, क्योकि हमारी कलाएं हमारी राष्ट्रीयता की पहचान हैं| आपने हमें अपने विचार रखने के लिए यहाँ आमंत्रित किया इसके लिए'इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र' एवं 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' का  बहुत आभार|
संपर्क:
सी-45/वाई-4 ,दिलशाद गार्डन,दिल्ली-110 095


गुरुवार, 9 मार्च 2017

चंदावती :धारावाहिक (उपन्यास ) ---किश्त-एक-
#भारतेंदु मिश्र
 
 दादा की तेरहवीं

 पूरे तेरह ब्राह्मण पधार चुके थे। उनके लिए अलग चौका लगवाया गया था, नई तेरह धोती अंगौछा, जनेऊ, थालियां ,लोटे, नये पाटे, तेरह तुलसीकृत रामायण के गुटके और तेरह शंख बाजार से मंगवाए गए थे।आस-पास के क्षेत्रों से चुने हुए तेरह ब्राम्हणों को निमंत्रित किया गया था ।उनकी शक्ल तो देखते बन रही थी गोरे सुंदर चुटिया धारी पंडित चंदन टीका लगाए इस प्रकार सजे संवरे लग रहे थे कि मानो अभी सीधे सीधे स्वर्ग से ही उतर कर आए हैं ।गांव के भकुआ लोग उनको आंखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे। छोटकऊ महाराज ने पीतल के थाल में उन सभी लोगों के चरण पखारे शिव प्रसाद व चंदावती ने नये अंगौछे से सबके पैर पोछे। मोलहे ने उनको देखकर सकटू से कहा भाई – ‘देखो तो ये कितने सुघड़ पंडित आये हैं।वाह,मन करता है इनको देखते ही रहें’ ‘ हाँ मोहले भाई, भाग्य अच्छा था हनुमान दादा का यह सब सुघड़ पंडित उनके लिए स्वर्ग की सीढ़ी बनाएंगे।‘ ‘ठीक कहते हो भाई, उनको स्वर्ग अवश्य मिलेगा , देवता थे हनुमान दादा, यह सब उनके कर्मों का ही प्रताप है - बहुत बड़े आदमी थे वो। अब ब्राम्हणों के टोले में कोई उतना प्रतिष्ठित आदमी नहीं रह गया है ।‘ हम तो यह भी कहते हैं कि दो-चार-दस गांवो में उनके जैसा आदमी खोजने पर नहीं मिलेगा।  हवन का धुआँ चारों तरफ फैल गया था। पूर्णाहुति होने के बाद शंख -घंटे बजने लगे। लिपे-पुते आंगन में तेरहों ब्राह्मणों की चौकियां सजा दी गई थी। सभी देवता नवग्रह ,कुत्ता, कौआ, गाय और पंचतत्वों का भोग लगा दिया गया था। अब सभी ब्राह्मण खाने लगे थे। वाह चन्दावती दाई इतना अच्छा प्रबंध, इतना बढ़िया भोजन बहुत वर्षो बाद मिला है। हनुमान दादा की आत्मा तो तुम्हें स्वर्ग से निरख रही होगी, और तुम्हे बहुत आशीष दे रही होंगी।--- -ब्राम्हणों के मुखिया ने कहा। चन्दावती की आंखें भर आयी। अपने आंचल में मुंह छुपा लिया। अब वहां पर उपस्थित सभी स्त्री-पुरुष तरह-तरह की बातें बनाने में लगेथे । रामफल दादा दूर बरामदे में बैठे थे। वो भी मौक़ा देखकर शुरू हो गए थे और गांव के लोग उनकी बतकही सुनने लगे-- पं. रामदीन शुक्ल और हनुमान दादा तो दौलतपुर की नाक थे। उनका बड़ा पौरुष था। दस पाँच कोस तक के गांव - क्षेत्र में उनका रुतबा था। दौलतपुर के सबसे बड़े किसान थे। गांव में बस उनके घर के दरवाजे पर ही ट्रैक्टर खड़ा है।‘ दौलतपुर में लगभग पचास घर थे जिनमे -तेली , कहार , धोबी , पासी , चमार , मुराऊ ,ठाकुर , मुसलमान , सभी जातियों के घर थे। गांव में ब्राम्हणों के कुल जमा तीन घर थे। किसी ने पूछा कितनी आयु थी हनुमान दादा की? रामफल ने फिर बताना चालू किया – ‘अभी तो मुश्किल से पैंसठ की उम्र हुई होगी , हमसे तो पाँच साल छोटे रहे , बस उनका समय पूरा हो चुका था, सो चल बसे। नामी पहलवान थे हनुमान भाई। अपनी जवानी में जब वो कुश्ती लड़ने जाते थे तो हमेशा विजेता बनकर लौटते थे। दौलतपुर की असली दौलत तो हनुमान भाई ही थे। जैसे-जैसे उनका पुरुषार्थ घटता गया वैसे-वैसे उनको गठिया,बाई परेशान करने लगी थी । बहुत दिनों से बिचारे दरवाजे वाले अखाड़े पर भी नही जा पाते थे , इस बात का उन्हें बहुत अफसोस था। बेचारे तैतीस वर्ष की उम्र  में ही विधुर हो गए थे। फिर दो वर्ष बाद उन्हें चन्दावती से प्यार हो गया, साहसी थे वो , नीच जाति की होने पर भी उन्होंने चन्दावती से शादी की और फिर पत्नी का स्थान दिया और इसी प्रकार चन्दावती हर पल उनके साथ रही।यद्यपि चन्दावती उनकी जाति बिरादरी की नहीं थी, उनकी अपनी बिरादरी में बहुत बदनामी भी हुई लेकिन जब उनको प्यार हो गया था तो उन्होंने अपने जीते जी हर प्रकार से निभाया । कहाँ बीस-बिसुआ के कनौजिया पंडित और कहा चन्दावती जाति की तेलिन। उस समय चन्दावती का गौना भी नहीं हुआ था ,जब उसके पति के मौत की खबर आयी थी। चन्दावती वास्तव में चंदा ही थी। उसकी उम्र बीस से अधिक नहीं थी उस समय। जो कोई भी उसको एक बार देख लेता वो देखता ही रह जाता। गांव की रामलीला में वो सीता बनती थी। वो ज़माना ऐसा था जब ब्राम्हणो , ठाकुरों की नजर नीच जाति की बहू बेटी पर पड़ जाती तो वो जब चाहे तब उसे अपनी हवस का शिकार बना लेते थे। उस समय गरीबो के घर की स्त्रियों की कोई इज्जत नही थी , क्योकि दबंगो के उपर कोई कानून नही लागू था। चन्दावती के घर वाले चन्दावती के प्रेम से अत्यधिक प्रसन्न हुए थे। ‘देखो दादा, सौ-सौ रूपये दक्षिणा में दिए जा रहे हैं’- मोलहे ने बीच में इशारा किया। ‘रामफल ने समझाया - ये तेरहवी वाले ब्राम्हण हैं इनको दूर से ही प्रणाम करना ।उनकी नजरों से बचकर ही रहना चाहिए'सकटू पूछने लगे - क्यों दादा ?' 'तुम तो यार यकदम बौडम हो .., यहाँ आये हो तेरही खाने , सवालो की बौछार कर रहे हो. ' 'सकटू भइया तुम जरा तम्बाकू तो बनाओ - लो चुनौटी पकड़ो । अब तम्बाकू ? ...अरे अब भोजन के बाद ही तम्बाकू खाना ।‘ ' अरे तम्बाकू की महिमा तुम्हे नहीं मालूम है, तो सुनो— .
 कृष्ण चले बैकुंठ को , राधा पकड़ी बांह
यहाँ तमाखू खायलो, वहाँ तमाखू नाहि
कुछ समझ मे आया , अभी बहुत समय है तब तक तमाखू बन सकती है जब तक खानदान के मान्य लोग नही खायेंगे तब तक हमारा नम्बर कैसे आयेगा ‘ ठीक कहते हो दादा l’ कहते तो हम हमेशा ही ठीक है, पर तुम सुनते तो हो नही बस मोबाइल कान में चिपकाये रहते हो , बहरे तो हो ही जाओगे ,बनाओ ...तमाखू बनाओ l तेरहो ब्राम्हण दक्षिणा लेकर चलने लगे| महाब्राम्हण के पैर छूकर चन्दावती ने उसको पाँच सौ रुपये अलग से दक्षिणा में दिए l प्रसन्नता से उसकी आंखों में चमक आ गई और उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर आशीर्वाद दिया फिर उसके बाद अन्य तेरहो ब्राह्मणों ने भी उसी प्रकार आशीर्वाद दिए l छोटकऊ महाराज चांदी की तश्तरी में तंबाकू, पान, इलायची, लौंग लेकर आए और आगे बढ़कर सबको देकर प्रणाम करके विदा किया | दो तांगे उन सबको ले जाने के लिये पहले से तैयार खड़े थे। उन दोनों साईसों ने भी भोजन कर लिया था। उनको किराया दिया जा चुका था और घर ले जाने के लिए परुसा भी बांध दिया गया था। जब सारे ब्राह्मण तांगे पर बैठ गए महाबाभन के इशारे पर तांगे हाँक दिए गए। हनुमान दादा की तेरहवी के समय पर आये दोनों घोड़ों की भी खूब दाना - पानी -मेवा आदि से सेवा की गयी थी । वह भी खा - पीकर खूब मस्त हो गए थे। अब तो कार वाला जमाना आ गया है, परंतु ये महाबाभनों के घोड़े तो अभी तक सौ साल पुरानी परंपरा को निभा रहे है। सकटू ने पूछा , दादा! ये ससुरे महाबाभन कार , जीप में न बैठकर ताँगे में क्यों चलते है। अरे ससुरे ढकोसला बनाए है, और तो कुछ नहीं हैl इनको कोई सुख के समय नहीं बुलाता है| अब जाने भी दो यह लोग जितनी जल्दी टले वही अच्छा l महाबाँभनो की विदाई के बाद मान्य लोगों के पैर धोए गए और फिर उनको भी पाटा पर बिठाया गयाl भोजन के पत्तल में सबसे पहले कद्दू की सब्जी परोसी गई जिसमें से पुदीने की सुगंध फैल रही थीl सोठवाले आलू की भुजिया , छुहारे वाला गलका , उड़द की दाल भरी कचौड़ी -पूड़ी और इन सबके साथ किशमिश चिरौजी वाली खीर , ये सारे व्यंजन भली - भाँति पुरानी रीति के हिसाब से ही बनाये गए थे। गांव के रिवाज के हिसाब से महाबाभनों के बाद घर के मान्यो को खिलाया जाता था, इसीलिए उनके लिए पत्तले सजा दी गई थीl रामफल, सकटू , मोहले के साथ बैठे थे। गांव व् आस -पास के क्षेत्र के तमाम लोग भोजन के इंतज़ार में तख्तो पर विराजमान थे। रामफल ने चंदावती की प्रेम कहानी फिर से शुरू कर दी थी। भोजन के इंतज़ार में बैठे हुए लोगो को इस सामयिक गाथा में बड़ा आनंद आने लगा था। रामफल की आयु सत्तर वर्ष से काम नहीं रही होगी , उन्होंने अपनी आंखों से सब कुछ देखा सुना था l पुराने सरपंच थे, किसी से डरते दबते नहीं थे l गांव में उनका सम्मान था l सकटू ने तमाखू बनायीऔर रामफल की तरफ बढ़ा दी- ‘लो दादा’ रामफल ने एक मोटी चुटकी रामफल के हाथ से भर ली और उसको गदेली पर रखकर अंगूठे से घिसा | तीन बार फटकार कर झाड़ कर फिर बाएं हाथ से ओठ खोलकर दाएं हाथ की छुटकी से ओठ के नीचे रख ली- अर्थात अब पूरी गाथा सुनाने के लिए उनको पूरी खुराक मिल गई थी l फिर सकटू के मोबाइल की घंटी बजने लगी l वो अपना फोन लेकर अखाड़े की तरफ चले गये l इनका प्रेम कैसे हुआ था दादा? मोलहे ने पूछा- किसको किससे कब मोहब्बत हो जाए इसका तो कुछ पता नहीं, यह तो दिल लगे का सौदा है। क्या पता कहाँ किस समय कौन मन को भा जाए , अच्छा लगने का कोई एक कारण नहीं होता बौड़मदास! कहां बीस बिसुआ के कनौजिया हनुमान महाराज और कहां तेलिन की विधवा बेटी चंदो- मोहब्बत हो गई l.. रावण और सीता के प्रेम की चर्चा बहुत दिनों तक होती रही l ‘यह सब किस प्रकार से हुआ l गांव में तो हम इनके तरह - तरह के किस्से सुनते रहे है – लेकिन आपने तो सबकुछ अपनी आँखों से देखा होगा l...’ ‘क्यों नहीं हमीं ने तो फैसला किया था l’ ‘किस बात का फैसला?’ अरे कई महीनों तक तो चोरी छिपे ये मोहब्बत चलती रही l जब ब्राम्हणों के मोहल्ले में खुसर - फुसुर बहुत होने लगी तो एक दिन छोटकऊ महाराज हमारे पास आए और कहने लगे - दादा अब तो आप ही कुछ कीजिए क्योंकि अब पानी सिर के ऊपर निकल गया है l हमने पूछा – ‘क्या हुआ?’ आप से क्या छुपा है सरपंच दादा,.... उस समय भी मैं ही सरपंच था| छोटकऊ बोले—‘ दद्दू उस तेलिनया चंदावती पर फिदा हो गए हैं l जाति- बिरादरी में सब मान- मर्यादा मिट चुकी है l अब तो घर और खेत के बँटवारे का समय आ गया है l अब आप ही हमको बचा सकते है दादा ------ हम पंचायत बुलाना चाहते हैl’ छोटकऊ! आखिर तुम चाहते क्या हो यह तो बताओ’ ‘ हम चाहते हैं कि हमारे परिवार पर उनकी इस निगोड़ी मुहब्बत का बेजा असर न पड़े। खेती न बटे, दद्दु के आगे पीछे तो कोई है नहीं l कहीं उस तेलिनिया के चक्कर में हमारा घर -खेत सब कुछ न बंट जाए l ठीक कहते हो भैया! , कोशिश किया जाए कि ऐसी नौबत न आवे l  फिर क्या हुआ? फिर हमने ही फैसला किया कि हनुमान और चंद्रावती ब्याह करके इसी घर में रहें l चंद्रावती के घरवाले चाहते थे कि हनुमान और चंद्रावती अलग उनके मोहल्ले में रहे l ब्राम्हणों के मोहल्ले के कुछ बदतमीज़ लोग भी यही चाहते थे कि इन लोगों का आपस में बटवारा हो तो उनकी ताकत कुछ कम हो जाएl हमने यह सब हाल देख सुनकर समय के अनुसार सही सही फैसला किया कि हनुमान दादा और चंदावती व्याह करके इसी घर में एक ही साथ रहेंगे ,बस अपनी रसोई अलग कर लेंगे l छोटकऊ या उनके बेटे या पत्नी को किसी प्रकार का ऐतराज नहीं होना चाहिए , यदि कोई एतराज होगा तो घर का बटवारा होगा और जब घर का बटवारा होगा तो फिर खेती का भी बंटवारा हो सकता है l हांलाकि उनके पिताजी ने पहले से ही खेती दोनों भाइयों के नाम करा दी थी जिससे कि दोनों मे लड़ाई - झगड़ा न हो l हनुमान और छोटकऊ दोनों ने उस समय इस फैसले को स्वीकार कर लिया था । ब्राम्हणटोला के बहुत लोग इनसे नाराज थे ख़ास कर इस शादी के कारण। क्षेत्र के ब्राम्हणों में आज भी इनके खानदान का कोई सम्मान नहीं रह गया है। इनके पास अच्छा ख़ासा पैसा है,रुतबा है लेकिन इस घटना के बाद बीस बिसुआ वाले ब्राम्हणों के यहाँ से इनकी रिश्तेदारी नहीं हो पायी। अब तो बात बहुत पुरानी हो गयी है । तभी सकटू ने संकेत किया की देखो मान्य लोग भोजन कर चुके है। इसी समय छोटकऊ महाराज ने रामफल दादा के पास आकर कहा दादा , चलिए आप भी भोजन कर लीजिये !, ‘चलो सकटू भाई तुम भी चलो।‘ ‘चलो भाई, चलो भूख तो बड़ी जोर की लगी है। सकटू , मोलहे ,रामफल ,शंकर , गनी मियां सब भोजन करने के लिए आगे बढ़ गए ।भोजन बहुत ही स्वादिष्ट बना था इसलिए सब लोगों ने भरपेट अच्छे मन से खाया। खाने के बाद पान सुपारी का प्रबंध किया गया था।
गांव में ठाकुर रामफल का सभी लोग सम्मान करते थे । चौसठ - भोला छाप तम्बाकू वाला पान खाकर जब ठाकुर साहब चलने लगे तब छोटकऊ ने कहा – प्रधान दादा , अब दद्दू तो चले गए,उनके साथ ही इस तेलिनिया का सम्बन्ध ख़त्म हो गया। किसी ज़माने में आपने ही यह ब्याह करवाया था , अब जब दद्दू नहीं रहे तो इस तेलिन को हम अपने घर में कैसे रहने दे सकते है ? 'भाई जो तुम्हारी समझ में आये वही करो लेकिन अब जमाना बहुत बदल गया है। इस ज़माने में औरतो , लड़कियों की बातो को थाने में बड़े ध्यान से सुना जाता है। बहन जी का शासन है कही लेने के देने न पड जाय| नेता , ऑफिसर सब नीची जाति के है। कही जेल की हवा न खानी पड़ जाय।' ' अब जो होगा वो देख लेंगे। पहले तो दादा की शर्म थी, अब जब वही नहीं है तो इस ससुरी को घर में कौन रखेगा। अब तेरहवी के साथ - साथ सारे कार्य निपट गए। बस कल इस तेलिन को घर से भगाएंगे तभी घर पवित्र होगा बाकि तुम लोगो का सहयोग तो मिलेगा ही.... ? ‘भईया ! हम सहयोग का वादा तो नहीं कर पाएंगे। पहले अपने मोहल्ले में आस पड़ोस में सबकी राय- सलाह कर लीजिए। हम तो लखनऊ जा रहे हैं। चार दिन डी एम साहब के साथ एक सम्मलेन में रहना है। हम इस काम में तुम्हारे साथ नहीं है। ' ‘क्यों दादा ?’ ‘भाई! बात यह है कि हमने ही तो यह फैसला किया था कि चन्दावती हनुमान भईया के साथ उसी घर में रहेंगी। अब जब हनुमान भाई नहीं रहे तो किस मुँह से हम यह बात कहे की चन्दावती को घर से निकाल दिया जाए। गांव की औरते आदमी सब उसके साथ खड़े हो जायेंगे। सबके साथ उसका व्यवहार बहुत अच्छा है। पहले खुद भली - भाँति  सोच - विचार लो फिर जो समझ में आये जैसा मन हो करना। अब हम जा रहे है। कल सबेरे हमें लखनऊ जाना है। 'ठीक है दादा राम - राम ‘ रामफल चले गए। धीरे - धीरे खास रिश्तेदार के अलावा सब अपने - अपने घर चले गए। फतेहपुर वाले जीजा , कानपूर वाले मामा , सकटू और मोलहे वही छप्पर के नीचे कोटपीस (ताश)खेलने लगे। नाती - पोते बहुएँ बेटियो से सारा घर भर गया था। आसपास के सब लोग चले गए थे लेकिन तब भी घर में चहल - पहल थी। चन्दावती रिश्तेदारो से दूर ही रहती थी , क्योकि सब लोगो को जाति बिरादरी के मामले में चन्दावती की जाति के अलावा उसका रूप - गुण व सद्व्यवहार आदि कुछ भी नजर नहीं आता था।सब उसके व्यवहार को नीच जाति के हिसाब से ही जांचते परखते थे| अब तो चन्दावती ने अपने अकेलेपन के कारण दुःख से निढ़ाल होकर चारपाई पकड़ ली थी। अपने समय की सुंदरी चन्दावती ने अपने बाल कटवा डाले थे; उसकी कलाइयां सूनी हो गई थी, उसकी मांग का सिंदूर उजड़ गया था। उसके माथे पर चमचम चमकती बिंदी गायब हो गई थी। हालांकि उसके सूने माथे पर बिंदी की जगह साफ़ अब भी झलक रही थी। आखिर इस घर में उसका था ही कौन? अब तो उस घर में चन्दावती का हाल पूछने वाला कोई भी नहीं था। चन्दावती अब अपने भाई - भाभी के साथ भी नहीं रहना चाहती थी। लेकिन उसका और कहीं ठिकाना भी नहीं था। हनुमान दादा जब से बीमार हुए थे तब से चन्दावती सबके व्यंगबाण सुनते-सुनते पक गई थी। जब तक हनुमान दादा जिंदा रहे तब तक चन्दावती के मुंह पर कोई भी किसी भी प्रकार की गलत - सलत बात कहने का साहस नहीं करता था। हालांकि घरवालों ने उसका नाम चन्दो चाची रख दिया था। पहले तो बड़े लोग दबी जुबान से उसे चन्दो - चन्दो कहते थे पर अब तो घर के छोटे- छोटे बच्चे तक उसे चन्दो कहने लगे थे। परंतु चन्दावती अपने दुख में ये सब अपमान की बातें भूल गई थी । जब एक माह पहले हनुमान दादा को मियादी बुखार चढ़ गया था तब से उनके अंतिम समय तक चन्दावती ने एक पैर पर खड़े होकर उनकी सेवा की थी। बैंक में जो तीस हजार रूपया जमा था वह सब उनकी बीमारी में उड़ गया था। जब दस - बारह दिनो तक उनका बुखार नहीं उतरा तो गांव के डॉक्टर ने उन्हें लखनऊ ले जाने की सलाह दी। चंद्रावती ने अपने गले की जंजीर व कानों के झुमके बेचकर उनका इलाज करवाया। लखनऊ के पी.जी.आई. हॉस्पिटल का खर्च बहुत अधिक था। बुखार तो हनुमान दादा के दिमाग में चढ़ गया था। अंत में वहां के डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया। अब जब वो बेसहारा हो गयी तब उसको अपनी ज़िंदगी बोझ लगने लगी। छोटकऊ तो इन तीस सालो से चन्दावती से अपनी दुश्मनी निभाते चले आ रहे थे। वो तो मन ही मन में हनुमान दादा के मरने का इंतज़ार ही कर रहे थे।जब तक हनुमान दादा सुनने समझने लायक थे,तब तक दिखावटी लल्लो चप्पो करते रहे| जैसे - जैसे उनकी तबियत बिगड़ती गयी , वैसे - वैसे छोटकऊ महाराज उनसे दूर होते गये। चन्दावती के पास अब कुछ भी नहीं बचा था। ब्राम्हणों -टोले वालो के अलावा दूसरी बिरादरी के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे। क्योकि दूसरी बिरादरी के लोग उसे शुक्लाइन समझ कर पैलगी(प्रणाम) करते थे। परंतु ब्राम्हणों ने उसका नाम चन्दो चाण्डालिन रख दिया था। उसकी जाति के ही कारण कुछ लोग इस प्रकार उसकी बेइज्जती करते थे। पर दूसरी (पिछड़ी ) जाति के लोग तो उसको शुक्लाइन ही कहते थे। और प्रणाम भी करते थे। गाँवो में नाम बिगाड़ने की परंपरा चलती है।उसी में दूषित मानसिकता वाले लोगो को आनंद आता है। एक बार हनुमान दादा ने बताया था कि नाम बिगाड़ने की परंपरा तो महाभारत के समय से चली आ रही है। कौरव दुर्योधन को दुर्योधन कहते थे परंतु पांडवों ने उसका नाम सुयोधन रखा था। क्योंकि पांडव उसको सुयोधन कहकर पुकारते थे और चिढ़ाते थे। कहते थे - जब हम चाहे तुम्हें जीत लेंगे क्योंकि सुयोधन का मतलब है जिसको बड़ी आसानी से जीता जा सके। दौलतपुर में इस तरह से उल्टा-पुल्टा नाम रखने वाले बहुत लोग थे जिनके पास बस इसी तरह के काम थे। पहले के दिनों में गरमियो में नीम की छाँव तले और जाडों में अलाव के पास बैठकर इसी तरह की बाते होती रहती थी, परंतु अब टेलीविजन आ जाने के बाद से इस तरह की बैठकी में कुछ कमी जरूर आ गयी है।
 शाम होते-होते ज्यादातर रिश्तेदार चले गये। अब सड़कें बन गई हैं तो आने जाने के साधन हर समय उपलब्ध रहते हैं| लेकिन छोटकऊ को तो चैन भी न पड़ी। हनुमान दादा का कमरा और बरामदा तो पहले से ही अलग था। बस थोड़ी सी झपकी ही आयी थी कि छोटकऊ बरामदे में लेटी हुई चन्दावती के पास पहुँच गए और कहने लगे- ‘तेलिन भौजी ! बहुत दिन हमारे घर में सो चुकी हो , अब जो तुमको इस घर में लाये थे वो तो चल गए। अब तुम अपने रास्ते जाओ।‘ चन्दावती को इस बात का अंदेशा तो पहले से ही था पर यह सब इतनी जल्दी होगा ऐसी आशा बिलकुल न थी। चन्दावती उठ कर बैठ गई चारपाई के नीचे रखे हुए लोटे में से दो घूंट पानी पिया, फिर पूछा – ‘क्या बात है छोटकऊ?.अब तो तुम्हारे दद्दू के साथ इसी घर में रहते हुए तीस साल हो गये है , अब क्या हो गया ? तीस साल पुराना फैसला तुम्हारे मिटाने से मिट जायगा ?... अभी सरपंच रामफल दादा मरे नहीं है उन्होंने ही हमारी शादी करवायी थी। घर में रहने का फैसला भी उन्होंने ही किया था।‘ 'अब जब दादा नहीं रहे तब वो शादी ..वो फैसला सब अपने आप खत्म हो गया। ' ‘तुम कौन होते हो भैया - फैसला ख़तम करने वाले। गाँव में पञ्च है प्रधान है वही लोग फैसला करेंगे।‘ ‘फैसला जब तक होगा तब तक शिवप्रसाद तुम्हारी क्या गति बना देगा , इसका अंदाज तो तुमको बिलकुल भी नहीं है। हम तो तुम्हारा भला चाहते है इसीलिए समझ रहे है। शिवप्रसाद तो अभी ..तत्काल तुमको घर से बाहर करने की ज़िद्द पर अड़ा है। तुम यदि अपनी इज्जत बचाना चाहती हो तो कल सबेरे इस घर में दिखाई न देना। रात में दरवाजा बंद करके ही सोना। हमारा फर्ज था सो तुम्हे समझा दिया है। बाकी जो तुम्हारी समझ में आये वो करो।  छोटकऊ चले गए। चन्दावती की आँखों से नींद उड़न छू हो गयी थी। वह डर गयी थी। झटपट बरामदे से उठकर कमरे के अंदर चली गई। इस समय तो उसे स्वयं सहारे की आवश्यकता थी। जिसके सहारे उसने अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया था, वही इस वृद्ध अवस्था में धोखा देकर भगवान के पास चला गया था। अब तो चन्दावती का जीवन एक कटी पतंग की भांति हो गया था। जब तक हनुमान दादा जीवित थे, तब तक उनके फैसले के सामने किसी प्रकार टीका टिप्पणी करने की छोटकऊ की कभी हिम्मत नहीं पडी थी। हमेशा सिर झुकाकर ठीक है दादा कहने वाले छोटकऊ के विनीत स्वभाव की चन्दावती की आदत हो गई थी। तीस वर्ष पहले जब चन्दावती इस घर में आई थी तब हनुमान दादा ने समझाया था कि पति पत्नी के बीच में कोई तीसरा न आने पाए तो जीवन रूपी गाड़ी भली प्रकार आगे बढ़ती जाती है। अब एक - एक बात चन्दावती की आँखों के सामने चलचित्र की भाँति चमकने लगी। एक बार हनुमान दादा ने चन्दावती को बताया था कि भगवान राम और सीता माता के बीच बड़ी गहरी समझदारी थी। तुलसीदास जी ने कहा है –
जल को गए लक्खन है लरिका ,परिखौ पिय छांह घरीक हुइ ठाढ़े।
 पोछि पसेऊ बयारि करौ , अरु पाय पखारिहौ भूभुरि डाढे।
 तुलसी रघुवीर प्रिया स्रम जानिकै , बैठि बिलम्ब लौ कंटक काढ़े
 जानकी नाह को नेह लख्यो , पुलकयो तनु वारि विलोचन बाढ़े।
 अर्थात जब राम जी वन को चलने लगे तो सीता जी ने कहा कि - स्वामी हम भी चलेंगे। तब श्री राम ने उन्हें बहुत समझाया की वन के ऊबड़ - खाबड़ मार्ग में तुम नहीं चल पाओगी परंतु तब भी वे मानी नहीं। रास्ते में जब सीता जी थक जाती थी तब राम को पता चल जाता था की इस समय सीता थकी हुई है। सबसे विशेष बात तो यह थी की राम ने सीता से कभी यह नहीं कहा की तुमने हठ क्यों की थी?राम ने कभी उन्हें चिढ़ाया नहीं कि अब लो मौज करो। बस राम तो सीता के मन की बात समझ जाते और चुपचाप किसी वृक्ष की छाया में बैठकर सुस्ताने लगते थे। इस कविता में सीता कहती है - प्रिय , घडी भर किसी वृक्ष की छाया में खड़े हो कर प्रतीक्षा कर लीजिये , क्योकि लक्ष्मण अभी छोटे है और वो पानी लेने गए है। जब तक वो आते है तब तक लाओ तुम्हारा पसीना पोछ दूँ। और अंगौछे से तुम्हे हवा कर दूँ| गलियारे की गरम - गरम धूल में तो तुम्हारे पैर जल गए होंगे पानी आ जाये तो आपके पाँव धो दूँ। ऐसी बाते सुनकर राम अपनी प्राणप्रिया सीता के मन की बात समझ गए कि वास्तव में सीता स्वयं ही थक गयी है ,तब राम ने तो उनसे कुछ नहीं कहा बस चुपचाप अपने पाँव के काँटे निकालने लगे. राम जब पाँव के कंटक निकालने के बहाने बैठ गए और देर तक काँटा निकालने के बहाने बैठे रहे। तो सीता भी उनके मन कि बात समझ गयी। वो समझ गयी की उनके प्रियतम उनके प्रेम के वशीभूत हो रहे है , उन्हें विश्राम कराने के लिए देर लगा रहे है|और बिना किसी प्रकार की बातचीत के वो चुपचाप बैठे है। यह सोचकर हर्षातिरेक से सीता के शरीर में सुरसुरी सी दौड गयी , पूरा शरीर रोमांचित हो गया था। इस प्रसंग के स्मरण होने से चन्दावती की आंखें फिर डबडबा गई, और आँखों से आंसुओ की धार बहने लगी। वह आगे सोचने लगी कि - अभी उनको मरे कुल तेरह दिन ही बीते है और छोटकऊ ने अपना असली रंग दिखा ही दिया। मानो वो इसी दिन का इंतज़ार कर रहे थे। सीता हो या मीरा इस संसार में प्रत्येक स्त्री को परिक्षा देनी ही पड़ती है| जिसका पति नहीं रहता उसका कोई सम्मान नहीं होता। औरत तो आदमी की छाया मानी जाती है|आदमी ख़तम तो औरत जीते जी अपने आप ख़त्म हो जाती है। विधवा का जीवन तो अपराधिनी की भाति ही कटता है। देखो अब मेरे भाग्य में क्या लिखा है। लेकिन छोटकऊ जो अपनी मनमानी करने पर उतारू है और शिवप्रसाद को हमें घर से निकलने के लिए तैयार किया है , इस समस्या से किसप्रकार निपटा जा सकता है। इसी बात का सोच - विचार करते - करते चारपाई पर पड़े - पड़े चन्दावती को झपकी लग गयी और वह सो गयी। रात के घने अन्धकार की कालिमा चारो ओऱ फैल गयी थी।

शनिवार, 7 जनवरी 2017




कहानी-
                           गुलाबी रूमाल
# भारतेंदु मिश्र
   
वो आठ नवम्बर की शाम थी| टीवी पर खबर सुनके बैठके में नोटबंदी की खबर पर चर्चा होने लगी| रज्जो जादा पढी लिखी न थी लेकिन,इतना समझ गयी थी कि रात बारह बजे के बाद से हजार और पांच सौ के नोट बाजार में चलने बंद हो जायेंगे| प्रधान मंत्री जी जिस तरह हर चैनल पर हाँथ हिलाकर नोटबंदी की घोषणा करते दिखाई दे रहे थे -लोग हैरत में थे| रज्जो के मन में भी एक डर बैठ गया था| उसको लगा कि शायद कोई उसे ही लूटे ले रहा हो, या कि कोई उसका गला घोटे दे रहा हो और वह रो नहीं पा रही है| टीवी पर खबर सुनके रज्जो बुआ बैठक से भीतर वाले कमरे में आ गयीं | इस मर्माहत करने वाली खबर के बाद आज की अन्य किसी खबर में उसकी कोई दिलचस्पी न थी| लेकिन रज्जो बैठके से ऐसे उठी कि जैसे यह खबर उसके काम की ही नथी| खबर सुनके नरेंद्र ने अपनी पत्नी से कहा -‘सुनती हो,बारदाने के जो बीस हजार रुपये रखे है वो सब बदलने पड़ेंगे...ये एक नई मुसीबत आ गयी..’
‘ हमारा तो ठीक है लेकिन ... भगवानी दादा....,जो हराम कि कमाई आवत है..उनका का होई ?...जो चार साल में गाडी –कोठी सब खरीद लिए हैं |’
‘अरे ,वो सब विधायक जी के आदमी है | उनकी चिंता न करो वो सब नोट बदल लेंगे ..तुम आपन फिकिर करो| ..रज्जो जीजी से पूछ लेव उनके पास ..सायद ..कुछ नोट पड़े हो|’
‘उनके पास कहां?...पिछले महीना कमल को जब डेंगू हुआ रहा तब पूछा रहे  ...दीदी  के पास होता तो निकाल के देती ..वो कमल से बहुत प्यार करती है|’
‘तो ठीक है ,चलो हमको ज्यादा परेशानी नहीं है| अच्छा हुआ कुछ तो नकली नोट बंद होंगे ..’ रज्जो के कान दीवार में चिपक गए थे|उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी|उसका दुःख ऐसा था कि जिसे कोई समझ नही सकता था, समस्या ऐसी कि वो परिवार में किसी से कह भी न सकती थी| तीन साल पहले पति के स्वर्गवासी होने के बाद अपने मायके रुकंदीपुर में हमेशा के लिए आ गयी थी| धन्य है हमारा ग्रामीण और कस्बाई  समाज जो आज भी बहुत कुछ सदियों पुरानी रीति रिवाज से जकड़ा है,और रिश्तो की शर्म अभी बाकी है | नरेंद्र ने बहन रज्जो को घर में रहने का अभयदान दे रखा था| बेवा निपूती रज्जो रुकंदीपुर लौट के ना आती तो आखिर और कहाँ जाती? पति बहुत चाहता था रज्जो को लेकिन विधवा होने के बाद देवर और उसकी पत्नी ने एक महीने में ही रज्जो को बेघर कर दिया| परिवार में जायदात के नाम पर खेती भी न थी| ले दे कर एक परचून की दूकान थी वो अब देवर महेश ही चलाता था| बस वही उस परिवार के भरन पोषण का साधन था| रज्जो ने पति के इलाज के समय अपना धराऊ जेवर बेच दिया था| आदमी  तो नहीं बचा लेकिन इलाज और क्रिया से बचे हुए उसके पास हजार के दस नोट जरूर थे| वो उसने सबसे छिपाकर रखे थे|
रज्जो ने तभी से एक बक्से में अपनी धराऊ पुरानी साड़ियों के बीच में उन नोटों को छिपा रखा था,बक्से में सदा ताला लगाये  रहती, चाभी लाकेट की तरह अपने गले में पहने रहती| ताकि उसके अलावा कोई दूसरा उसे न खोले| भाभी ने एक दो बार पूछा भी कि इस बक्से में ऐसा क्या है ? तो रज्जो ने जवाब दिया था –‘अरे कोई संपदा तो है नहीं कुछ तुम्हारे जीजा के ख़त है| वो ख़ास हमारे लिए लिखे गए हैं |दो साड़ी है- जो वो हमारे लिए बड़े मन से लाये थे|उनकी दो तस्बीर हैं|सुबह नहा धो के हम उनका ध्यान करती है..बस| जेवर सब उनकी बीमारी में बिक गया था..’
लेकिन आज रज्जो को नीद न आयी| जब सब सो गए तो धीरे से रज्जो ने अपना बक्सा खोला रात की मद्धिम रोशनी में गुलाबी साडी के पल्लू के नीचे छिपाकर रखे हुए हजार वाले उन नोटो को आहिस्ता से निकाला फिर इधर उधर देखकर उन्हें दो बार गिना| इसके बाद फिर वही रखने लगी लेकिन मन न माना,कभी लाल और बैंजनी छवि वाले सब नोटों को नजदीक से निहारा फिर चूमा और तीसरी बार गिनकर उसी पल्लू के नीचे छिपाकर रख दिया| ये बात उसने किसी से न बतायी थी| डेंगू होने पर भतीजे कमल के इलाज के वक्त भी उसने नोट नही निकाले हालांकि उसके स्वस्थ होने के लिए माता का व्रत पूजा करने में वो पीछे न थी| समय पर इलाज हो गया तो कमल बच भी गया|लेकिन रज्जो बुआ के नोटों का राज किसी को जाहिर न हो पाया| अपने प्यारे भाई –भौजी और कमल के साथ उसने जो छल किया था वह उसे आज बेचैन किये जा रहा था| उसने उठकर पानी पिया|कुछ बेचैनी कम हुई फिर उसे याद आया ,मरते वक्त पतिदेव ने उसे समझाया था-‘रज्जो ! हम रहै न रहै,इस जमाने में पैसा दबा के रखना आखिर में वही काम आयेगा|’ अब जब पति परमेश्वर चले गए तो उनकी बात का पालन उसने नियम से किया ...इसमे धोखा कैसे..हुआ?| फिर भी आज उसकी हिम्मत डोल गयी थी| ऐसा कुदिन आयेगा उसने सोचा ही न था|अब उसके नोट बेकार हो गए थे|..मुसीबत ये थी कि वो नोट बदले कैसे ? रात भर पति की हिदायत याद करती रही| भाई के निस्वार्थ प्रेम और रिश्ते को लेकर मन ही मन शर्मसार होती रही | कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था| अपने भाई भाभी की नजरो में गिर जाने की आशंका अलग से उसे खाए जा रही थी|अगर कमल की बीमारी में वो ये रुपये भाई को दे ही देती तो ठीक होता,लेकिन अब क्या हो सकता है ?..उस वक्त का झूठ अब उसे छिपाने के लिए क्या बहाना बनाए..सब साफ़ बता देने से भाई, भाभी और बेटे जैसे भतीजे कमल का विश्वास खो जाएगा|..पता नहीं बहन की इस धोखेबाजी को नरेंद्र क्या समझेगा ? समझेगा भी कि नहीं? क्या किया जाए इसी ऊहापोह में वह डूबी थी,तभी उसे बक्से में वो गुलाबी रूमाल नजर आया| ये उसी धराऊ साडी के साथ उसके पति ने दिलवाया था| रज्जो की आखें चमक गयीं |उसने सभी नोट उस रूमाल में बांधे और अपने सीने में ब्लाउज में छिपाकर रख लिए| सुबह होने वाली थी| जल्दी तैयार होकर मंदिर के लिए निकल पडी|
दिमाग में उधेड़बुन चलती रही उसने सोचा कि मंदिर में दान कर दूँ-पति परमेसुर के नाम से,लेकिन भगवान ने हमारी कौन सी सुन ली है- फिर विचार आया कि पंडित जी को देकर नोट बदलवा लिया जाए..लेकिन उसको भी कहानी बतानी पड़ेगी- वो कौन हमारा सगा है,ये बेईमानी कर लेगा तब ?गाँव में सबको हमारे झूठ का पता चल जाएगा..सब हमारे नाम को थूकेंगे| ..अब इस उम्र में लगी झूठ की कालिख कैसे पुछेगी ?...पैसा कोई चोरी का तो है नही ...कालाधन थोड़े है| मंदिर में काली की मूर्ति के सामने वो देर तक देवी की स्तुति करती रही|आखें बंद करते ही सब काला नजर आने लगा| उसने जल्दी से आखें खोल ली| मंदिर का एक चक्कर लगाया|घंटा बजाया ... इस बार फिर उसने ध्यान के लिए आखें बंद की तो भाई भाभी और कमल का चेहरा नजर आने लगा- अब उसने देखा कि भाभी के हाथ में खप्पर है,भाई के हाथ में त्रिशूल है और कमल के हाथ में तलवार है|तीनो उसके गुलाबी रूमाल में बंधे रूपये छीनने को आगे आ रहे है| ..उसने फिर आँख खोली और बुदबुदाने लगी-कालाधन नहीं है ..कालाधन नहीं है..|
पंडित ने पूछ लिया-‘का हुआ रज्जो बुआ?’
कुछ नहीं पंडित जी सब ठीक है| रज्जो ने सोचा चलो बैंक की तरफ देख के आते हैं| वह स्टेशन के पास कस्बे के एक मात्र पंजाब नेशनल बैंक के निकट पहुँच गयी | वहां हजारो की भीड़ लगी थी|पुलिस वाले लाठी भांज रहे थे| उसने औरतो की लाइन के पास जाकर देखा वहां भी लम्बी लाइन थी|तभी लाइन में लगी एक गर्भवती औरत गश खाकर गिरी उसे जोर का लेबरपेन हो रहा था| आसपास की औरतो ने उसे संभाला उसने वही बच्चे को जन्म दिया | थोड़ी देर में उस औरत के घर वाले आ गये थे|रज्जो यह सब देखकर और घबरा गयी| मगर वो अपना काम नहीं कर पायी...रुपये बदलने की उसकी चाहत मन में ही धरी रह गयी| उसने सोचा कि गाँव का कोई देख लेगा तब भी हमारी पोल खुल जायेगी| इतनी भीड़ न होती तो शायद चुपचाप कोशिश कर लेती|
बैंक से वापस घर आयी और रुमाल से सारे नोट निकाले उन्हें गिना फिर उन्हें माथे से लगाकर गुलाबी पल्लू वाली साडी की परत में उसी तरह छिपा दिए| अक्सर हारने के बाद हिम्मत आ जाती है| अब रज्जो के पास कोई विकल्प नहीं था| दूसरे दिन रज्जो ने हिम्मत करके अपनी भाभी से सब सच्चाई बता दी|
‘अरे दीदी,कमल कि बीमारी में भी तुमने....मदत नहीं की..ये मलाल तो हमको जिन्दगी भर रहेगा|..ये तो कहो कि वो माता की कृपा से ठीक हो गया|’
‘भौजी..गलती तो बहुत बड़ी है..लेकिन अब हमारी इज्जत तुम्हारे हाथ में है|..दूसरोँ से जादा हमे भैया औ कमल कि चिंता है|..उनकी नजरो में हमें न गिराना हाथ जोड़ के बस यही बिनती है| तुम जो चाहो हमको सजा दे दो|’ इसके बाद रज्जो अपना मुह पीटने लगी|
‘अरे रुको दीदी,..अब बस करो ..हम मान भी जाए तो ये कैसे होगा दीदी! या तो इज्जत जायेगी या फिर पैसा हाथ से..’
‘....काहे भौजी?
‘अरे हम अपना पैसा बताएँगे तो तुम्हारे भैया नोट बदल के अपने धंधे में लगा लेंगे| बदलने जाओगी तब राज खुल जाएगा | नहीं बताएँगे तो ये नोट कूड़ा हो जायेंगें..|’    
‘तो अब क्या किया जाए ?.. तुम्ही बताओ ?’
‘दीदी! अगर पैसा औ इज्जत दोनों बचाना है तो एक रास्ता है..अगर आप तैयार हो..मगर ..उसमे खर्चा है |’
‘बताओ..कोई तो रास्ता बताओ ?..’
‘अरे अपने गाँव का मंगलुआ,दस के आठ दे रहा है..आठ हजार चाहिए तो बताओ. ?’
‘ठीक है भौजी!..,नासपीटे को दो हजार दे देंगे|यही सही रहेगा..दो हजार का नुक्सान होगा ..मगर बात छिपी रहेगी ... इज्जत बची रहेगी |...ये लो चाभी बक्सा खोलो |’
भौजी चकित होकर रज्जो को देखती रही फिर चाभी लेकर उस बक्से की ओर  बढ़ी  जिसका रहस्य जानने की उत्सुकता उसके मन में तीन साल से बनी हुई थी| वह बक्सा खोलने के लिए उसने लपक कर चाभी पकड़ ली थी |रज्जो ने कहा-‘गुलाबी साड़ी के पल्लू में देखो दस नोट मिलेंगे|’
नोट गिनते हुए भौजी ने कहा-‘ हाँ दीदी! पूरे दस हैं...ये साड़ी भी बहुत सुंदर है दीदी!..लेकिन..’
‘लेकिन अब हमारे काम कि नहीं रही ..गुलाबी रंग वाले चार नोट मंगलुआ से ले आना ..बस ध्यान रखना ये बात हमारे तुम्हारे बीच रहे|..साड़ी तुम्हारा इनाम है ..रख लो| हमने एक ही दफा पहनी है ..’
रज्जो ने गुलाबी रूमाल से अपनी भरी हुई आँखे पोछ लीं|
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रविवार, 30 अक्तूबर 2016

लेखक बनने के लिए

पं.अमृतलाल नागर से भेंटवार्ता
(वर्ष 1986 मे नागर जी से की गयी मुलाकत के अंश)
पुराने लखनऊ मे चौक मुहल्ले का अलग स्थान है।एक ओर बडा इमामबाडा ,भूलभुलौया,गोलदरवाजा,घण्टाघर मेडिकल कालेज आदि प्रसिद्ध इमारतें तो दूसरी ओर भांग ठंडाई वालो की पुरानी दूकाने यहां की गलियो में कहीं बेले की माला बेचने वाले बरबस आपके गले मे माला डाल देंगे तो कहीं वेश्याओ के उजडे हुए कोठे सुनसान दिखाई पडेंगे।आसपास ही आप आप की भाषा मे हंसी मजाक करते हुए लोग भी मिल जाएंगे।यहीं एक गली में थोडी दूर चलकर ही एक भव्य कोठी है।जिसके दृढ और विशाल कपाटों को देखकर ही उसकी प्राचीनता और भव्यता का प्रमाण मिल जाता है।इसी मे प्रसिद्ध सिने अभिनेता शशिकपूर ने अपनी फिल्म जुनून का छायांकन किया था।यही कोठी प्रख्यात कथाकार उपन्यासकार पं.अमृतलाल नागर जी का निवास स्थान रहा है।इधर का इलाका आरम्भ से ही रंगीनियो का और मस्तियो का इलाका रहा है।
यह मुलाकात सन 1986 मे की गयी थी।उनदिनो बाबू जी अस्वस्थ चल रहे थे।यद्यपि उस समय उनकी दृष्टि और श्रवण शक्ति कमजोर हो रही थी किंतु उनकी सर्जनात्मक शक्ति एवं चिंतनजन्य आनन्द उन्हे सतत कुछ नया देने के लिए संकल्पबद्ध करता जाता था।तभी उनसे लखनऊ यात्रा मे युवारचनाकार मंच की ओर से नवलेखन पर की गयी एक मुलाकात के कुछ अंश-
भा.मि.-उपन्यासों के प्रचार प्रसार और विस्तार के आगे नाटको का विस्तार कम हो गया है,जबकि पहले नाटक मे ही उपन्यास के सारे तत्व मिल जाया करते थे।आपकी दृष्टि में इसका मुख्य कारण क्या है?
नागर जी-
नाटक की परंपरा भारत मे बाहरी आक्रमणो के कारण समाप्त हो गयी।पहले वही खेले जाते थे तब उन्ही का विस्तार भी था।नाटक बडी व्यवस्था चाहता है।उपन्यास को केवल पाठक चाहिए।संस्कृत मे कादम्बरी उपन्यास है।दशकुमारचरित,कथासरितसागर,हितोपदेश आदि मे कहानियां हैं।संकृत मे कथा लेखन काफी विस्तार मे मिलता है-नाटको का तो है ही।आधुनिक काल में हिन्दी मे नाटक तो प्रारंभ हुए परंतु कुछ परिस्थितियां ऐसी हुईं कि हमारे देश में हिन्दी का पेशेवर रंगमंच नही बना।शौकिया रंगमंच बाबू भारतेन्दु आदि ने शुरू किया लेकिन महाराष्ट्र मे आज भी रंगमंच है।परंतु वह हिन्दी से नही विकसित हुआ।वह व्यवस्थित है ,इसीलिए वहां थियेटर चलते हैं।रंगमंच की दृष्टि से इतनी प्रौढता भारत में कहीं भी नही आयी कि केवल नाटक ही देखे जायें यदि ऐसा होता तो शायद उपन्यास कम पढे जाते।नाटक पढने के लिए नही लिखे जाते।दूरदर्शन रेडियो आदि पर कितनी खपत हो सकती है।अत: उपन्यास विधा आगे आयी और यह विधा विस्तृत होती गयी।निराला जी भी नाटक लिखना और मंचन करना चाहते थे।एक संस्था भी बनी किंतु कुछ हुआ नही।
भा.मि.-
आपके द्वारा आनूदित विष्णुभट्ट कृत ‘मांझा प्रवास’का हिन्दी अनुवाद ‘आंखों देखा गदर’नवभारत टाइम्स दैनिक मे छपा।देश मे इसप्रकार का जीवंत इतिहास विभिन्न भाषाओ मे बिखरा पडा होगा।फिर हिन्दी के रचनाकारो की दृष्टि इस ओर क्यो नही पडती?
नागर जी-
हमारे यहां दिक्कत ये है कि पिछले कुछ वर्षो में साहित्य के किसी भी पक्ष उपन्यास हो या कविता किसी विधा की उचित समीक्षा नही मिलती है।हिन्दी के बुद्धिजीवियो मे भी यह कमी है कि वह जीवंत इतिहास को पहचानने की ललक नही रखता।फिरभी दृष्टि ही न जाती तो गदर के फूल कैसे लिखता मैं।हम अंग्रेजी के माद्ध्यम से ही अन्य भारतीय भाषाओ को पढते हैं।यदि उसी भाषा मे पढे तो अच्छा हो बिना भाषा को समझे उस भाषा के साहित्य को समझा तो जा सकता है परंतु अनुभव की तरलता और संवेदनाओ का स्पर्श नही किया जा सकता।यह परिश्रम हर व्यक्ति के बस का नही है।इसीलिए नवलेखन मे मौलिकता का प्राय: अभाव सा दिखता है।
भा.मि.-
इधर भाषा के आधार पर रचनाकारो में प्रांतीयता या क्षेत्रीयता ही अधिक देखने को मिल रही है।हिन्दी के लोग हिन्दी भाषी प्रांतो तक ही जाने माने जाते हैं।हिन्दी के रचनाकार अहिन्दी भाषी प्रांतो मे जनमे महापुरुषो तथा उनके आदर्शो पर क्यो नही लिखते? जबकि रचनाकार तो वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा मे ही जीता है?
नागर जी-दक्षिण भारत या अन्य क्षेत्रो से जुडे लोगो के बारे मे कहा है(लिखा है)पर वह कम है।यह कमी तो हमारे बुद्धिजीवी की ही है।दूसरी ओर यह जागरूकता का प्रश्न है।रवीन्द्र जी के साहित्य में ...कंचन...की बात है जो जागरूक साहित्यकार होता है वह इन सब बातो का ध्यान रखता है।भाषा का विरोध राजनैतिक स्तर पर है।मै 1945 मे मद्रास गया था।वहां शिक्षक रखकर मैने तमिल सीखी।वहां भी लोग हिन्दी पढते और सीखते हैं इसके अतिरिक्त अध्ययन प्रवास और पर्यटन भी आवश्यक है।समंवय की दृष्टि लाने के लिए यह आवश्यक है।वस्तुत:रचनात्मक कार्य के लिए यह आवश्यक नही कि किसी क्षेत्र विशेष या व्यक्तिविशेष के लिए आग्रह हो।कहानी मानव की है आप यह कह सकते हैं लेखन मे आज उस तरह की स्फूर्ति नही  है।आज लेखक के संघर्ष हैं उसकी समस्या जीविकोपार्जन है।अत: वह जिज्ञासा को जागृत भी नही कर पाता भारत ही क्या विश्व की बात का पता भी और वहां के आदर्शो का चित्रण होना चाहिए।आवश्यक मात्रा आदिसे बचने के लिए हमे सीमित रह जाना पडता है।
भा.मि.-
करवटें उपन्यास के बाद आपने इधर कुछ नया शुरू किया था।उसके बारे मे कुछ बतलाइए?
नागर जी-करवटें मे 1850 से 1902 तक का एक ऐतिहासिक कालखण्ड है।इस नई कृति में 1902 से अ986 यानी आजतक की बात कहना लक्ष्य है।बीसवीं सदी के अंग्रेजी पढे लिखे मध्यवर्गीय समाज की समस्याओ को हमने इसमे लिया है।शीर्षक बाद मे रखेंगे।इधर हमारी दृष्टि भी शिथिल हो रही है।श्रवण शक्ति तो पहले से ही कमजोर है।बिना पढे तो कुछ लिखा ही नही जा सकता।अभी तक चौथाई कार्य ही हुआ है।धीरे धीरे प्रयास चल रहा है।
भा.मि.-गद्यलेखन में विशेषत: कथात्मक लेखन के लिए आपकी दृष्टि मे कौन सी बातो का ध्यान रखना आवश्यक है?
नागर जी-
संस्कृत मे एक उक्ति है-जिसका अर्थ है-देशाटन राजदरबार, वेश्या का घर,हाट इन सबको घूमे बिना कोई कवि या लेखक नही बन सकता।मै मेहतओ के पीछे घूंमा हूं।कोठो पर गया हूं।पर्यटन किया है।दस प्रतिशत प्रतिभा और नब्बे प्रतिशत श्रम लेखक को अच्छा लेखक बनाता है।हिन्दी मे प्रतिभा की कमी नही है।दिशा की कमी है।जमीन पर पैर नही रक्खा ब्रम्ह की बात करने लगे।संस्कृति लचीली होती है जो जडता नही सिखाती।जंहा जडता है वहां प्रगति कैसे संभव है।समय को पहचानिए समय के साथ चलिए।तब तो कुछ बात बनेगी।
प्रस्तुति :भारतेंदु मिश्र  







भरतकालीन कलाएं:-
भारतीय सौन्दर्य दर्शन और कला चेतना /चिंतन से जुड़े मित्रो को सूचनार्थ -
संगीत नाटक अकादमी -द्वारा आचार्य अभिनवगुप्त सहस्राब्दी वर्ष -2016 में प्रकाशित मेरी पुस्तक का आवरण अब ये पुस्तक संगीत नाटक अकादमी ,रवीन्द्र भवन ,नई दिल्ली के काउंटर से खरीदी जा सकती है| 


मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं--
मोहनराकेशऔरधर्मवीरभारती जैसे लेखको के रचनाकर्म को नईअर्थवत्ता प्रदान करने वाले ,हिन्दी रंगमंच में प्राण फूंकने वाले इब्राहिम अलकाजी को जन्मदिन की शुभकामनाएं|उनका रंगकर्म लगातार हमें सीखने की प्रेरणा देता है|
अलकाजी का जन्म18 अक्तूबर 1925 पुणे में हुआ था. उनके पिता सऊदी अरब के कारोबारी थे. उनकी मां कुवैत की थीं
नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "अलकाजी के रुप में मुझे प्रेरित करने वाला टीचर मिला. वो मुझे पसंद करते थे और मेरा हौसला बढ़ाते थे. वो कठिन मेहनत कराते थे ताकि मेरी क्षमताओं का विकास हो सके."
अलकाजी का एनएसडी में पहला नाटक मोहन राकेश का 'आषाढ़ का एक दिन' था. इस नाटक में मुख्य भूमिका ओम शिवपुरी और सुधा शिवपुरी ने निभाई थी.
इसके बाद उन्होंने धरमवीर भारती के नाटक 'अंधायुग' का फिरोजशाह कोटला में मंचन किया. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी नाटक देखने गए थे. उन्होंने पुराना किला में गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक़ का मंचन किया.
1977 में उन्होंने एनएसडी के निदेशक का पद छोड़ दिया. उसके बाद वो रंगमंच से भी एक तरह से दूर हो गए. 1990 के दशक में उन्होंने थोड़े समय के लिए रंगमंच पर वापसी की और एनएसडी में तीन नाटकों का निर्देशन किया.
करन थापर को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैं चाहूंगा कि लोग मुझे मेरे समूचे रंगकर्म के लिए याद करें, न कि केवल एनएसडी के मेरे कार्यकाल के लिए."