मंगलवार, 6 मार्च 2018

सहभागिता ही दाम्पत्य का मूल सिद्धांत है




# डॉ.भारतेंदु मिश्र
चर्चित कथाकार अशोक गुजराती का नाम हिन्दी कहानियों के लिए जाना जाता है |अभी हाल में ही ‘बीर-बहूटी’ शीर्षक उनका नाटक बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है|यह नाटक समकालीन स्त्री पुरुष के मनोवैज्ञानिक द्वंद्व को लेकर लिखा गया है|दाम्पत्य जीवन के द्रश्य बहुत मार्मिक ढंग से लेखक ने प्रस्तुत किये हैं|प्रमुख पात्र चंद्रहास और उसकी पत्नी अरुन्धती  है,जबकि सहायक पात्र अक्षत और वसुंधरा के अलावा किशन -रूपा ,रोचक- रिदम और डाक्टर हैं|
पूरा नाटक तीन अंकों में विभक्त है|कथाकार लेखक शहरी मध्यमवर्गीय पात्रों को लेकर अपने कहन और परिस्थितियों के सृजन को लेकर आगे बढ़ता है|जीवन की मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को जिस तरह से शराब पीकर पात्रों द्वारा हल करने की कोशिश की जाती है वह शहरी मध्यवर्ग के परिवारों में आम बात  है|लेकिन नाटक की स्त्रियाँ इसे बुरा नहीं मानतीं बल्कि पुरुष पात्रों का सहयोग करती हैं|अरुंधती  का किरदार एक प्रगतिशील महिला के प्रतीक के रूप में लेखक ने अच्छे ढंग से उपस्थित किया है|वह स्वयं भी नौकरी करती है और वसुंधरा को भी नौकरी करने की प्रेरणा देती है|अक्षत और वसुंधरा के दाम्पत्य को सुव्यवस्थित करने की सलाह भी वही देती है| नाटकीयता चंद्रहास के और अरुंधती के दाम्पत्य संबंधों से आगे बढ़कर नर नारी संबंधों की पड़ताल करते हुए कथानक को आगे ले चलती है|चंद्रहास पुरुष स्वाभिमान या अहंकार का प्रतीक है|नाटक में  जीवन की परिस्थितियाँ उसे नौकरी चली जाने से उत्पन्न खंडित अहं वाले, अवसाद ग्रस्त बेरोजगार व्यक्ति के रूप उपस्थित करती हैं| ऐसा करके अरुंधती के पात्र को लेखक ने स्पेस दिया है ताकि स्त्री के कामकाजी पक्ष को विधिवत सामने लाया जा सके|
नाटक जिस समस्या को लेकर आगे बढ़ता है वह स्त्री पुरुष संबंधों की आपसी समझदारी और विश्वास में इजाफा करना है| अरुंधती का कथन है-‘नहीं,तुम स्त्री को अभी तक समझा नहीं पाए|अपवाद हो सकते हैं परन्तु कोइ समझदार औरत बिना किसी विशेष परिस्थिति के कभी भी अपने चरित्र से समझौता नहीं करेगी|और यदि आदमी जैसी वह किसी कारण ऐसा दुस्साहस कर जाती है तो तुम्हारे पुरुष प्रधान समाज को ऐतराज क्यों है?’(पृ-13,बीर-बहूटी )
असल में लेखक का मानना है कि पुरुष को पराई स्त्री से संबंध बनाने पर मर्दवादियों पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता लेकिन जब कोई स्त्री पराये पुरुष से ऐसा करने की बात सोचती है या करती है तो वह वेश्या के समकक्ष धिक्कारी जाने लगती है|लेकिन अब समाज बदल चुका है हमारे घर परिवार की शक्ल भी बदल गयी है|पुरुष को नौकरी करनी चाहिए और बाहर के काम जबकि स्त्री को घर में रहकर बच्चों को संभालना चाहिए यह मर्दवादी सामाजिक शहरों से ख़त्म हो रही है लेकिन इस सोच को पूरी तरह से नष्ट होने में समय लगेगा|अभी तक वह सहिष्णुता का वातावरण बन नहीं पाया है|नाटक में ‘बीर-बहूटी’ का सार्थक नैसर्गिक जीवन दर्शन लेखक देने का प्रयत्न करता है|असल में स्त्री और पुरुष प्रकृति के दो खिलौने हैं,जिनमें कोई बड़ा या छोटा नहीं होता|परन्तु अभी बहुत कुछ हमारे जीवन में जस का तस है| खासकर मध्यवर्ग के दाम्पत्य जीवन में वैसी सहभागिता और सदाशयता नहीं आ पायी जैसी प्राकृतिक स्वाभाविक स्वतंत्रता की कल्पना की जाती है|वास्ताव में समानता पर आधारित सहभागिता ही दाम्पत्य जीवन का मूल है| टूटे हुए अंहकार को मिली संजीवनी की तरह चंदर को नाटक के अंत में जब दूसरी नौकरी मिल जाती है तब वह उस सुख को समझने के लायक नहीं रहता|यह भी पता नहीं चल पाता कि नायक चंदर के चहरे पर आयी प्रसन्नता अक्षत द्वारा अरुंधती को दीदी कहने से उत्पन्न हुई है या कि बहुत दिनों बाद फिर से अच्छी नौकरी मिल जाने से| पात्र चयन कथावस्तु के अनुरूप ही है|संवाद कहीं कहीं यदि और मांज दिए जाते तो नाटकीयता का प्रभाव और बढ़  जाता,तथापि मंचन करने वाले अभिनेता अपने हिसाब से संवादों को छोटा या बड़ा कर लेते हैं|अच्छे मुद्दे को लेकर समसामयिक  सामाजिक विषय के नाटक हेतु लेखक अशोक गुजराती को बधाई |
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बीर-बहूटी-(नाटक)/लेखक-अशोक गुजराती/प्रकाशक-बोधि प्रकाशन/वर्ष-2018/मूल्य-60/रु.  

बुधवार, 8 नवंबर 2017

पोनू का दाखिला/एक मौक़ा दीजिए (नाटक)


लेखक-भारतेंदु मिश्र 

(परवेज उर्फ़ पोनू एक नेत्रहीन बालक है| उसकी विधवा मा उस बच्चे के स्कूल में दाखिले के लिए बहुत परेशान है,स्थान दिल्ली  की एक सामान्य किन्तु मलिन बस्ती –शास्त्री पार्क| घर का सीन )
जरीन: क्या बताऊ ?...सब तरफ से हार गयी हूँ ..कोई मेरे बेटे  का दाखिला  नहीं  करता|(घर में बर्तन साफ़ करते हुए बार बार आंसू निकल आते हैं |)
नजमा: (अखबार का पन्ना लेकर )..अम्मी...ओ अम्मी!...अखबार देखा  आपने..?
जरीन: अरे ..रहने  दे ,कंही  भूकंप आया होगा,कोई हादसा होगा...  किसी की मौत की खबर  होगी ?..अच्छी  खबर  तो कुछ  होती  नहीं ..
नजमा: नहीं..अम्मी !सरकार ने विज्ञापन निकाला है |अब  ब्लाइंड बच्चे भी अपने घर के करीब के स्कूल में पढ़ाई कर सकेंगे..
जरीन: (झाडू फेक कर नजमा को गले लगाते हुए )..हाय...नजमा ! तू सच कह रही है ?...हाय ,अल्ला!..
नजमा: हाँ !..अम्मी मैं सच कह रही हूँ |ये अखबार में लिखा है..
जरीन: काश!...मेरे परवेज का दाखिला  हो जाए..
नजमा: चलिए ..अमजद  के स्कूल चलते हैं |दोनों भाई एक साथ जाया करेंगे...
जरीन: चल बेटा!..पोनू ! स्कूल चलते हैं|
(स्कूल पहुंचकर ,दाखिला इंचार्ज  के पास..)
जरीन: नमस्ते ,साहब!
इंचार्ज: जी नमस्ते,
जरीन: साब,मेरे लडके  का दाखिला करना है| रजिस्ट्रेशन कर लीजिए..
(बिना सर उठाये..लिखते हुए )
इंचार्ज: जी,बच्चे  का  नाम ?
जरीन: जी परवेज,..
इंचार्ज: उम्र ?
जरीन: 12 साल|
इंचार्ज:(सर उठाकर..) कहाँ है बच्चा ?
जरीन: जी! साब,ये रहा ...
इंचार्ज: बहन जी ये तो ब्लाइंड हैं ?
नजमा: तो क्या हुआ?..अखबार में आया है सभी  तरह  के बच्चे घर के पास के स्कूल में पढ़ सकते हैं |
इंचार्ज: ठीक  है ,मै ..तो कह नहीं सकता, आइए ..आप हमारे प्रिसिपल साहब से मिल लीजिए..
नजमा : जी ठीक  है..
(दाखिला इंचार्ज के साथ तीनो प्रिंसिपल के कमरे की ओर जाते हैं|)
इंचार्ज: (चपरासी  से ) रामलाल!..साहब  हैं?
रामलाल : बैठे हैं ,जाइए..
इंचार्ज: (भीतर जा कर ) सर! ये बहन जी इस ब्लाइंड बच्चे के दाखिले के लिए आयी हैं ...
प्रिंसिपल: जी बताए ...
जरीन: साहब ! हमारा एक बच्चा  यही पढ़ता है..मेरे इस बच्चे  का भी दाखिला कर लीजिए..दोनों भाई साथ आ जाया करेंगे ..
नजमा: सर! ..ये देखिए ..आज के अखबार में भी विज्ञापन निकला है..
प्रिसिपल: देखिए ये नामुमकिन है..आपका वो बच्चा नार्मल है| ये ब्लाइंड है|..इसे ब्लाइंड स्कूल  में ले जाइए..
नजमा: लेकिन सर! ये अखबार..
प्रिंसिपल: जाइए..हमारा समय  बर्बाद मत कीजिए..
नजमा: लेकिन सर! ये विज्ञापन ...
प्रिंसिपल: तो जाइए ...अखबार वालो के पास जाइए ..हमारा समय बर्बाद मत कीजिए..रामलाल!..इन्हें बाहर करो..
जरीन: साहबा  मेहेरबानी कीजिए..
रामलाल: आपको समझ नहीं आता...साहब  बहुत बिजी हैं ..चलिए  बाहर चलिए..|
 (घर वापस आकर,दूसरे दिन )
नजमा; अम्मी!..आपने हमारे कपडे प्रेस नहीं किए..आप हमारा कोई काम नहीं करती हैं ...
जरीन: हाँ नहीं किए..तू अपना काम खुद कर लिया कर..अब बड़ी हो गयी है...आज छुट्टी के दिन तुझे कहा जाना है ?
नजमा: मुझे मूवी देखने जाना है...
जरीन: अभी पिछले महीने तो गयी थी..
नजमा: तो क्या हुआ अब बजरंगी भाईजान नई मूवी देखने जा रही हूँ |
अजहर : मै  भी चलूँगा,आपा!..
नजमा: मै अपनी सहेली के साथ जा रही हूँ ..तू कहाँ कबाब में हड्डी बनेगा ?
पोनू : आपा! आपा! ..मुझे भी ले चलो..
नजमा : लो कर लो बात..हाय,अल्ला, आँखों से दिखाई नहीं देता ...मूवी  देखेंगा..
जरीन: जाना है तो तीनो साथ जायेंगे..
नजमा: पोनू को तो नहीं ले जाऊगी ..मै इसको पकड़ के घूमूंगी कि मूवी देखूंगी..न..अम्मी ...  इसे नहीं ले जाऊंगी|
अजहर: ले चलते  हैं ..हम दोनों मिलके संभाल लेंगे..
नजमा: तू अकेले संभाल सके तो ले चल, मै तो नहीं ले जाऊंगी..
(जरीन के बार बार कहने पर भी नजमा और अजहर पोनू को रोता हुआ छोड़कर चले जाते हैं |)
पोनू : मेरे साथ  ऐसा ..हर दफा होता है..अम्मी!..(.रोते हुए जमीन पर लोट जाता है..जरीन उसे संभालती है |)
जरीन: मै तुझे लेकर चलूंगी..चल, तेरा मन पसंद हलवा खिलाती हूँ |
पोनू : कुछ नहीं खाना..मुझसे बात मत करो| (फिर रोने लगता है|)
जरीन: (प्लेट में हलवा देती है )..ले हलवा खा ले..
(पोनू उसे फेक देता है|जरीन किसी तरह उसे बहलाने की कोशिश करती है| कपडे सिलने के लिए सिलाई की मशीन चलाने लगती है| इसीबीच मोहल्ला सुधार समिति वाले शुक्ला जी आते हैं | )
शुक्ला: जरीन आपा! ..ओ जरीन आपा!
जरीन: जी ,शुक्ला जी आइए..बैठिए |
शुक्ला : जी ठीक है ,बैठने का वख्त नहीं है ..आप अपने लडके का नाम और उम्र लिखवा दीजिए..मै एम्.एल.ए.साहब की मीटिंग में जा रहा हूँ |वहाँ उसके दाखिले की बात करूंगा..
जरीन: जी शुक्ला जी! अगर ऐसा हो जाए तो बड़ी मेहेरबानी होगी |..लिख लीजिए-नाम है - परवेज,उम्र 12 साल|
शुक्ला: कोई विकलांगता का प्रमाणपत्र है ?
जरीन: और तो कुछ भी नहीं है मेरे पास..
शुक्ला: उसको और क्या परेशानी है  ?
जरीन: परेशानी तो कुछ भी नहीं है शुक्ला साहब!..अब क्या बताऊ, एक देखने के अलावा मेरा परवेज हर काम में मेरे तीनो बच्चो में सबसे ज्यादा हुशियार है|
शुक्ला: आप चिंता  न  करे..इसका दाखिला कराऊंगा..
जरीन: जी शुक्रिया शुक्ला जी |
(नजमा और अजहर फिल्म देखकर आते हैं )
नजमा: यार,क्या मस्त मूवी बनाई है..गूंगी बच्ची का रोल कितना बढ़िया है..
अजहर: हां,और वो गाना भी  बेहतरीन है..सेल्फी..वाला|
(परवेज गाना गाता हुआ आता है|)
परवेज: चल बेटा सेल्फी ले ले रे..
नजमा: तुझे कैसे मालूम?
परवेज: मुझे सल्लू भाई  की सारी फिल्मो के गाने और स्टोरी याद हैं |
नजमा: एक बात तो है अम्मी! हमारा  पोनू है बहुत इंटेलीजेंट |
जरीन: बात तो तू ठीक कह रही है|..बस इसका स्कूल में दाखिला हो जाए..|अभी शुक्ला जी आये थे,इसका दाखिला कराने  की बात कह रहे थे|
नजमा: हो जाएगा अम्मी! ..अब तो सरकार ने विज्ञापन  भी निकाल दिया है.. 
जरीन: अरे,  तुझे क्या मालूम, लाचार बेवा की कौन सुनता है..देखा था..प्रिंसिपल ने कैसे बात की थी|
(शुक्ला जी का प्रवेश..)
शुक्ला जी: जरीन आपा,..क्या कर रही हैं...
जरीन: ..करना क्या..बस घर के काम कर रही हूँ ..
शुक्लाजी:- छोडिये ये सब चलिए परवेज का दाखिला कराने चलते हैं..
जरीन:- जी चलिए शुक्ला जी मैं तो आपका इंतज़ार कर रही थी|
(जरीन,परवेज के साथ शुक्लाजी स्थानीय स्कूल पहुंचते है| एडमीशन इंचार्ज से मिलते है| )
शुक्लाजी:- मास्टर साहब ,ज़रा इस बच्चे का दाखिला कराना है ..
एडमीशन इंचार्ज: - (सर झुकाए हुए कुछ काम करते हुए )जरूर कराइए ,हम इसी के लिए बैठे हैं जनाब|(सर उठाकर देखते हुए)...लेकिन भाई साहब ,ये तो ब्लाइंड बच्चा है...
शुक्ला जी :- फिर क्या हुआ..?
एडमीशन इंचार्ज:- इसका तो दाखिला नहीं हो सकता...
शुक्ला जी;-- क्या बात करते हो..कौन है तुम्हारा प्रिंसिपल ज़रा उससे मिलवाओ..एम्.एल.ए. से लिखवाके लाया हूँ|
एडमीशन इंचार्ज:- जी जनाब ,प्रिंसिपल साहब उधर सामने वाले कमरे में बैठे हैं..
शुक्ला जी:- चलो जरीन आपा..(तीनो प्रिंसिपल के आफिस की और जाते हैं | साहब का दरबान बताता है| )
रामलाल:- साहब अभी बिजी है|
शुक्ला जी;- उनको बता दो नेता जी आये है ,ये मेरा कार्ड है..
रामलाल :- रुकिए ,देखता हूँ ..
(नेता का कार्ड देखकर प्रिंसिपल बुला लेता है|)
शुक्ला जी:- साहब,मैं इस परवेज के दाखिले के लिए आया हूँ |
प्रिंसिपल :- शुक्ला जी,ये बहन जी पहले भी आ चुकी है |इन्हें समझा चुका हूँ |अब ये आपको ले आयीं|..ये बच्चा पढेगा कैसे? लिखेगा कैसे?...इसे ब्लाइंड स्कूल में दाखिल कराओ|
शुक्लाजी;- ब्लाइंड स्कूल तो यहाँ कही है नहीं...ये तो इसी स्कूल में पढेगा..फिलहाल मैं विधायक जी से लिखवा के आया हूँ..जरूरत पडी तो ऊपर भी जाऊंगा|
प्रिंसिपल:- आप तो नाराज होने लगे..बैठिये..आप भी बैठिये बहन  जी| रामलाल!..ज़रा एडमीशन इंचार्ज को बुलाओ..
रामलाल :- जी साब!
एडमीशन इंचार्ज:- सर,ये बहन जी दो बार पहले भी आ चुकी है |इन्हें समझा चुके हैं|
 प्रिसिपल:- कोई बात नहीं समावेशी शिक्षा के अंतर्गत अभी इनका दाखिला कर लेते हैं| फिर देखते हैं |
एडमीशन इंचार्ज:- ठीक है सर|..किसकी क्लास में भेजूं ..
प्रिंसिपल:- शर्मा जी की क्लास में भेजो|..जाइए आप भी शर्मा जी से मिल लीजिए|..रामलाल,जाओ इन्हें 6 बी के क्लास टीचर  पी.के.शर्मा जी से मिलवाओ|
रामलाल:- आइये..(कमरे से बाहर निकल कर ) क्या नेता जी ..हमारे स्कूल में इस अंधे बच्चे का दाखिला करा रहे हो?...
शुक्लाजी:- (रामलाल का कंधा पकड़कर हिलाते हुए)..तू कौन है ?तुझे क्या तकलीफ है?..दुबारा इस बच्चे को अंधा कहा तो नौकरी साफ़ हो जायेगी|
रामलाल:- (हाथ जोड़कर )गलती हो गयी साहब!... लीजिए ये शर्मा जी बैठे हैं ..आप बात कर लीजिए|
शुक्ला जी:- शर्मा जी! इस बच्चे का दाखिला आपकी क्लास में हुआ है|
शर्मा जी:- ज़रा पेपर्स दिखाइए..ओ ..नो..आप ज़रा बैठिये ,मैं प्रिंसिपल से मिलकर आता हूँ|
(प्रिसिपल के कमरे में )
शर्माजी:- ये क्या किया सर?..मैं ही मिला था दुश्मनी निभाने को..मेरी क्लास में ...ब्लाइंड बच्चा कैसे पढेगा..कैसे लिखेगा..मेरे बस का नहीं है सर!...कोई स्पेशल टीचर भी नहीं है स्कूल में ..
प्रिंसिपल:- शर्मा जी! आप तो घबरा गए..इसके लिए ब्रेल बुक्स आयेंगी|इसे राइटर देना होगा|स्पेशल एजूकेशन टीचर भी चाहिए| सब फ़ाइल बनाकर ऊपर भेजते है|..आप तो जानते है..सरकार इन्क्लूसिव एजूकेशन पर कितना जोरे दे रही है|..हम दाखिले को मना नहीं कर सकते..नौकरी खतरे में पड़ जाएगी..|
शर्मा जी;- मुझसे क्या दुश्मनी है सर ? आपने ..तो कह दिया..
मेरा तो सिर भन्ना रहा है|
प्रिंसिपल:- परेशान ना हो ..इसका भाई अजहर भी 8वीं पढ़ता है| उसके साथ और बच्चो को लेकर इसका एक पीयर ग्रुप बन जाएगा|
(स्टाफ रूम का सीन,अध्यापक बात कर रहे है -)
एक- सुना है इस स्कूल में अब ब्लाइंड बच्चे भी पढेंगे..
दो- अरे पी.के.शर्मा जी की क्लास में दाखिला भी हो गया..

तीन- अब स्कूल का सत्यानाश हो गया|
चार;- सही बात है..वो बच्चा कही गिर गिरा पडा तो मुसीबत हो जायेगी|
शर्माजी;-मेरी जान संकट में है, मैं तो ट्रांसफर की सोच रहा हूँ..
एक:- ये कोई समाधान थोड़ी हुआ ..आप जाओगे तो दूसरे टीचर के गले में हड्डी लटक जायेगी..|आप चिंता मत कीजिए ..हम सब साथ है|..प्रिंसिपल से बात करेंगे|
(छ महीने बाद,अचानक स्कूल के प्रिसिपल के पास फोन आता है )
प्रिंसिपल- हेलो .. जी परवेज हमारे स्कूल में ही पढ़ता है..क्या हुआ ?....जी ..अरे वाह!..ये तो बहुत खुशी की बात है|..जी धन्यवाद|
(घंटी बजाकर ..)
प्रिंसिपल: रामलाल,ज़रा परवेज के क्लासटीचर शर्मा जी को बुलाओ...
रामलाल: क्या हुआ साब!...
प्रिंसिपल:परवेज ने कमाल कर दिया|....बुलाओ शर्मा जी को ..
रामलाल:-साब! बुलाये हैं
शर्मा जी: अब ..क्या है ?
रामलाल: परवेज के चक्कर में ..कोई फोन आया है ..
(प्रिंसिपल के कमरे में )
प्रिंसिपल: अरे शर्मा जी! कमाल हो गया...भई ,आपका परवेज स्टेट का बेस्ट टैलेंटेड स्टूडेंट चुना गया है ...मुबारक हो आपको ,उसने तो स्कूल का भी नाम रोशन कर दिया|3 दिसम्बर को शिक्षा सचिव के हांथो उसको पुरस्कार दिया जाएगा|
शर्मा जी: कमाल है साब! ..वो है तो बहुत टेलेंटेड ..बस देखने की समस्या है वरना..
प्रिंसिपल: बुलाओ ज़रा उसकी अम्मी को बुलाओ..फोन कीजिए|
शर्माजी: जी सर!(फोन लगा कर)..हेलो बहन जी ! आप परवेज की अम्मी बोल रही हैं...अगर आप स्कूल आ सकती है तो..परवेज के बारे में बात करनी है|

शर्मा जी: (प्रिंसिपल से ) सर वो आ रही है...
(जरीन प्रिंसिपल के कमरे में प्रवेश करती है|सभी उसका स्वागत करते हैं|)
जरीन:- साहब! नमस्ते|
प्रिंसिपल- नमस्ते बहन जी!..आपका परवेज तो बहुत होशियार है..उसने तो हमारे स्कूल का नाम रोशन कर दिया|उसे गायन में  में स्टेट में बेहतरीन स्टूडेंट का अवार्ड मिल रहा है|
जरीन:- जी जनाब! ..ये तो बहुत खुशी की बात है| साहब! मैं तो पहले भी आपसे कहती थी कि..बस इसे एक मौक़ा दीजिए..
प्रिंसिपल: जी आप सही कह रही थीं |..अब हमने उसके लिए पढाई का सब इन्तिजाम भी कर लिया है| ब्रेलबुक सरकार से मिल रही है |एक स्पेशल टीचर भी स्कूल में आ गया है|इसे अलग से स्कालरशिप तो मिल ही रही है|आप भी समारोह में चलिए..
जरीन: बड़ी मेहेरबानी है आपकी |
प्रिसिपल: बहन जी ! इसमें मेहरबानी कैसी?..ये तो हमारा काम है|
(सभी पात्र हम होंगे कामियाब/हम होंगे कामियाब /हम होंगे कामियाब कहते हुए मंच से बाहर जाते हैं| )

############################################################प्रस्तुति: भारतेंदु मिश्र 
  



रविवार, 13 अगस्त 2017

पुस्तक समीक्षा
नाटकों से पाठ्यचर्या को बेहतर बनाया जा सकता है
डॉ॰ भारतेंदु मिश्र
बच्चों को सिखाने के लिए नाटक एक सशक्त माध्यम है। आधुनिक समय में अधिकांश विद्यालयों में रचनात्मक शिक्षक इस विधा को अपनी पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाने लगे हैं। प्रसंगवश अभी कथाकार बलराम अग्रवाल के 15 ऐसे ही छात्रोपयोगी नाटकों की पुस्तक ‘आधुनिक बाल नाटक’ शीर्षक से प्रकाश में आई है। लघुकथा के क्षेत्र में बलराम अग्रवाल एक बड़ा नाम है। इसके साथ ही बाल साहित्य के क्षेत्र में उनका काम लगातार पढ़ा सराहा जाता रहा है। इस संग्रह में संकलित कई नाटक अनेक प्रदेशों की पाठशालाओं के पाठ्यक्रमों में भी शामिल किये जा चुके हैं। जैसाकि ‘अपनी बात’ में लेखक ने स्पष्ट किया है—इस पुस्तक में संकलित नाटक ‘जरूरी खुराक’ को केरल शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा 7 में, ‘पेड़ बोलता है’ को हिमाचल शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा 4 में और ‘सूरज का इंतज़ार’ मुम्बई की शिक्षण संस्थाओं द्वारा कक्षा 6 में पढ़ाया जा रहा है। पढ़ाया जा रहा है।
बलराम अग्रवाल अनेक वर्ष रंगमंच पर सक्रिय रहे हैं। अत; माना जा सकता है कि उन्हें नाटक की मूलभूत आवश्यकताओं की समझ है। उन्होंने इन नाटकों को बालमनोविज्ञान की अपनी समझ के आधार पर रचा है। इनमें वर्णित प्रसंगों और दृश्यबंधों को लेखक ने जीवन के दैनन्दिन आयामों से चुना है। ये नाटक यथार्थ जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी देने वाले भी हैं और खेल-खेल में बच्चों को जीवन की सीख भी दे जाते हैं। बच्चों के लिए इन नाटकों का बड़ा महत्व है। इस पुस्तक में कुल 15 बाल नाटक संग्रहीत हैं जिन्हें एकांकी और नुक्कड़ के शिल्प में लिखा गया है। इसके साथ ही इन्हें तीन खंडों में विभाजित भी किया गया है। पहले खंड में जीवन के प्रेरक प्रसंगों पर आधारित पाँच नाटक हैं जिनमे  क्रमश: ‘अपना सुल्लू’, ‘जरूरी खुराक’, ‘चमत्कारी छडी’, ‘होई हो हे हे’, ‘लुटेरे राम नाम के’ शामिल हैं। दूसरे खंड में चार नाटक महात्मा गांधी जी  के जीवन के प्रसंगों पर आधारित हैं, जिनके शीर्षक  हैं—‘मोहनदास का साहस’, ‘पश्चात्ताप के आँसू’, ‘सूरज का इंतजार’ और ‘मालिक मजदूर और नेता’। इसी खंड में एक नाटक नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवन की घटना पर भी केन्द्रित है जिसका शीर्षक है—‘आजादी के दीवाने’। तीसरे खंड में पर्यावरण संरक्षण तथा वृक्षों की उपयोगिता पर केन्द्रित पाँच नाटक हैं, जिनका शीर्षक है—‘पेड़ बोलता है’, ‘पीपल बोलता है’, ‘नीम बोलता है’, ‘बेल बोलता है’ तथा ‘पेड़ बचेगा तभी बचेंगे’।
इन नाटकों की विशेषता यह है कि ये सहजता से बच्चों को उनकी अपनी सरल भाषा में समझ में आने वाले हैं। अध्यापकों द्वारा बिना किसी बड़े इंतजाम के इन्हें विद्यालय स्तर पर खेलाया जा सकता है। जीवन और शिक्षा को जोड़ने के लिए नाटक बेहतरीन प्रयोग तो होता ही है। आधुनिक शिक्षा मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि नाटकों के माध्यम से पाठ्यचर्या को बेहतर बनाया जा सकता है। आशा है पुस्तक में संग्रहीत इन नाटकों से भाई बलराम अग्रवाल को यश मिलेगा और शिक्षा जगत में इस पुस्तक समुचित आदर होगा। लेखक को बधाई।
पुस्तक : आधुनिक बाल नाटक लेखक : बलराम अग्रवाल प्रकाशक : राही प्रकाशन, ए-45, गली नं 5, करतार नगर, दिल्ली-110053 प्रथम संस्करण : 2017 मूल्य : 200 रुपये
समीक्षक संपर्क : डॉ॰ भारतेंदु मिश्र, सी-45/वाई-4 ,दिलशाद गार्डन,दिल्ली-110095
फोन-9868031384 ई-मेल—b.mishra59@gmail.com


शुक्रवार, 16 जून 2017

                      भारतीय कला एवं राष्ट्रीयता
                     (व्याख्यान/दिनांक -16/6/2017)
                            #भारतेंदु मिश्र :

कला चेतना का संबंध हमारी सभ्यता के उद्गम से ही जुडा हुआ है| इसमें स्त्री और पुरुष की सामान रूप से भागीदारी की कल्पना की गयी है| कलाएं हमारी संस्कृति का अंग हैं-जिसमें आदिदेव महादेव की कल्पना की गयी है वह कश्मीर से कन्याकुमारी तक और पूरब से सुदूर पश्चिमी तट तक फ़ैली हुई है|ये शिवालय,जो कि हर एक गाँव –कस्बा या कि शहर में पाए जाते हैं ये हमारी भारतीय कलाओं की चेतना का मूल प्रतीक चिन्ह है|इन शिवालयो में  वास्तु है, मूर्ति है, चित्र है,संगीत और नृत्य है|ये शिवालय ही शिव आराधन की परंपरा में हमारी कलाओं के आदि केंद्र के रूप में विक्सित हुए| कालिदास की चेतना में शिव और पार्वती-‘वागार्थ इव संपृक्तौ’ –अर्थात वाणी और अर्थ के सामान जुड़े हुए हैं| वही तो अर्धनारीश्वर हैं जिनकी कल्पना दुनिया की किसी अन्य सभ्यता में शायद ही की गयी हो | यहाँ स्त्री और पुरुष मिलकर सामान भागीदारी से नई मनुष्यता का ही सृजन नहीं करते बल्कि अपने जीवन निर्वाह के साथ ही नवोन्मेषशालिनी कलाओं का भी सृजन करते है|जब शिव तांडव करते है तब पार्वती लास्य करती हैं|-
नृत्यावसाने नटराज राजा ननाद ढक्कां नवपंचाबारं
उद्धर्तुकामा सनाकादिसिद्धे:एतद्विमर्शे शिवसूत्र जालम|
अर्थात जब शिव का तांडव नृत्य हुआ तो शिव के डमरू का स्वर ब्रम्हांड के चौदहों भुवनो में व्याप्त हुआ और उसी परिवर्तन के क्षण में 14 माहेश्वर सूत्र निकले जिन्हें लेकर पाणिनि ने ‘अष्टाध्यायी’ जैसे व्याकरण के ग्रन्थ की रचना की,जो कालान्तर में  व्याकरण भाषा और काव्य नाट्य आदि कलाओं का उद्गम बने| इसी प्रकार जब देवी पार्वती का लास्य हुआ तो सरगम निकले जिससे संगीत और नृत्य जैसी कलाओं की चेतना विकसित हुई|ऐसा हमारे पारंपरिक चिंतको का मानना है| परा वैदिक युग में कलाओं और कलाकारों को पूर्ण स्वतंत्रता थी ,कालान्तर में बौद्ध दर्शन के प्रभाव स्वरूप मूर्तिकला,वास्तुकला और चित्र कला –स्वास्तिक,शंख,मंगल कलश आदि के रूप में जहां विक्सित हुई, वहीं संगीत,नृत्य,नाटक आदि का ह्रास हुआ|संगीत ,नृत्य, नाटक आदि का विकास विक्रमादित्य और कालिदास के समय से पुन: आरम्भ हुआ|भारतीय कला चेतना वस्तुत: प्रकृति रूपा है|सूर्य निकलता है तो उसकी रश्मियों से इन्द्रधनुष निर्मित हो जाता है|आदिम काल से ऐसा ही होता आ रहा है|उस इन्द्रधनुष की लय-लोच और रंगों के अनुपात का संयोजन प्रकृति ही करती है|पुरुष और प्रकृति दो ही तो मूल तत्व हैं-इस धरती के|वे ही तो आदि कारण है –इस सृष्टि के| समुद्र का अनहद राग,पर्वतो से फिसलकर निकलने वाली नदियों की कलकल ध्वनि ,स्त्री पुरुषो के नाना रूपाकार उनके विविध आचार व्यवहार आदि सब मूलत: प्रकृति का ही पर्याय है|यह सब



समानांतर सृजन सूक्षम पुरुष और मूल प्रकृति के आनंद का हेतु है| वह आनंद ही भारतीय कला चेतना का उत्स है| वही जो सत्य के रूप में प्रतिष्ठित है ,वही जो शिव है -वही जो सुन्दर है| हम सबका जीवन सौन्दर्य की यात्रा भर है|इस जीवन यात्रा में कौन किस पद्धति से जाता है ,किस माध्यम को चुनता है,कितना समय लगाता है,किस दिशा में जाता है, यह कलाओ के रूपाकारो और कलाकारों की रुचियों पर निर्भर करता है| कला का उद्देश्य ही आनंद प्रदान करना है-‘कम लाति या सा कला’ कला शब्द की निरुक्ति से हमे अर्थ प्राप्त होता है कि-‘जो आनंद प्रदान करे वही कला है’| आनंद या आत्मिक सुख का ही एक स्वरूप है किन्तु कला चेतना के आधार पर सहृदयो ने काव्यकला  के आनंद को काव्यानंद कहा और संगीत और नृत्य के आनंद को नादानंद कहा| तुलनात्मक सौन्दर्य दर्शन की बात करें तो कला समीक्षकों ने – संगीत और नृत्य के लिए -नाद ब्रम्ह,काव्य और अभिनय के लिए-रस ब्रम्ह ,स्थापत्य  वास्तु आदि के लिए -वास्तु ब्रम्ह जैसी कल्पना की है|अर्थात विभिन्न कलाओं के प्रयोजन को ब्रम्हानंद से जोड़ा गया है|यह अनिर्वचनीय आनंद ही हम कलाओं से गृहण करते हैं|ये कलाए ही हमारे जीवन की अभिरुचियो को संस्कारित भी करती है| ये रस तो ब्रम्हानंद सहोदर है| अग्निपुराण में कहा गया-‘रसो वै स:’ अर्थात वो रस ही ब्रम्ह  है|इसीलिए हमारी प्राचीन शिक्षा को इस आनंद के मार्ग से जोड़ा गया है|कलाए मनुष्य को संस्कारित करती है|कुछ तो ललित कलाए है जैसे –अभिनय,काव्य,संगीत,नृत्य,वास्तु,चित्र और मूर्तिकला|दूसरी  अन्य उपयोगी कलाए-और शिल्प जैसे –काष्ठ शिल्प,लौह शिल्प,माली,मुकुटकार ,स्वर्णकार,वस्त्रकार ,कारूक (रथ बनाने वाले)आदि|सहस्रों वर्षो से ये कलाएं हमारे बृहत्तर भारतीय समाज में व्यवसाय के रूप में व्याप्त रही हैं|जन रूचि के आधार पर उनके रूप और उपयोगिता में बदलाव आता रहा | परन्तु ललित कलाए राज्याश्रय के कारण अपने मूल स्वरूप के निकट ही रहीं| इतिहास में अनेक ऐसे अवसर आये जब कलाओं को राजसत्ता से उपेक्षा और तिरस्कार भी मिला |लेकिन कलाकारों ने सत्ता की उपेक्षा के कारण कष्ट सह कर भी अपनी जीवन शैली नहीं बदली|दूसरी ओर राज्याश्रय स्वीकार करने वाले -कवि ,वास्तुकार,रंगकर्मी/नृत्यांगना ,चित्रकार, संगीतकार आदि के बारे में हम जानते है कि इन कलाकारों की उपस्थिति ज्यादातर  राजाओं /सामंतो और नवाबो के यहाँ हमें इतिहास में देखने को मिलती है|उन पर सत्ता का अंकुश भी रहा|भारत में जब कभी शासन की निरंकुशता का वातावरण समाज में बना तो –काव्य,नाट्य,संगीत,वास्तु,मूर्ति,चित्र स्थापत्य जैसी  कलाओं को एक समय में मंदिरों और शिवालयों मे स्थान मिला |दूसरी ओर स्तूपों ,गिरिजाघरो, मस्जिदों और मकबरों जैसी जगहों में संगीत के अलावा वास्तु,स्थापत्य,चित्र जैसी कलाओं को स्थान मिला|इसके अलावा हमारे समाज में उपयोगी कलाओं और शिल्पों को जनता ने अपनी जीवनचर्या का हिस्सा बना लिया, इस कारण ये कलाएं लोक व्यापी हुई और कलाकार की जातियों में बदलती चली गयीं|अर्थात किसी कला व्यवसाय को लगातार अपनाने के कारण ही बढ़ई,लुहार,सुनार,जुलाहा,कुम्हार जैसी जातियां बनती चली गयी|आज भी हम अपने भारतीय समाज में इन विभिन्न कलाकारों की जातियों को देख रहे हैं लेकिन आज उनकी स्थिति पहले से भिन्न है|आज कई स्तरों पर ये कलाकारों की जातियां समाज की मुख्यधारा से कट गयीं हैं और पिछड़ गयीं हैं |हमें इनके जातीय कौशल को पहचानकर इन्हें अपनी कलात्मकता को जीवित रखने के समुचित अवसर प्रदान करने होंगे| हमारा देश ललित कला और उपयोगी कला दोनों कला रूपों से संपन्न रहा है| ‘नाट्यशास्त्र,मानसारवास्तुशास्त्र तथा शुक्रनीतिशास्त्र’  जैसे ग्रंथों में प्राचीन कलाओं की लम्बी सूची दी गयी है|जिनके भेदोपभेद मिलाकर कलाओं की संख्या सहस्रों में पहुँच जाती है|प्राचीन काल में कला को पुरुषार्थ का साधन भी माना गया अर्थात कला साधना द्वारा-धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष जैसे पुरुषार्थ को भी अर्जित किया जा सकता है| यद्यपि चाणक्य जैसे चिन्तक की राय इससे भिन्न है|उधर यूनानी विचारक प्लेटो ने भी कला को भ्रम ही माना है| हमारे प्राचीन विचारको ने कभी भोगवाद को बढाने वाली कलाओं को कला नहीं माना|उनकी मान्यता थी कि वही कला श्रेष्ठ है जिसके माध्यम से आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है –
विश्रान्तिर्यस्या संभोगे सा कला न कला मता
लीयते परमानंदे ययात्मा सा परा कला|
कालिदास अपने नाटक मालविकाग्निमित्रम (1/4 ) में नाटक को चाक्षुषक्रतु कहते हैं|  
नाटक प्रेक्षकवर्ग को आह्लादित करनेवाला मनोरम अनुसंधान है| यह जातिभेद ,वर्गभेद, वयोभेद,लिंगभेद  आदि नैसर्गिक एवं सामाजिक विभेदों से निरपेक्षभिन्न रुचि की जनता का सामान्य रूप से समाराधन करनेवाला एक कांत, 'चाक्षुषक्रतुहै।क्योकि नाटक समस्त कलाओं के समावेश और समायोजन से ही खेला जाता है|इसी लिए ‘नाट्यशास्त्र’ को समस्त कलाओं का कोश और पंचम वेद कहा गया है|सभी कलाओं में रस की चेतना ही आनंद का मूल है|
जहां तक हमारी राष्ट्रीयता का प्रश्न है तो हमारे वैदिक ऋषियों ने हमे केवल भारत के भूभाग ही नहीं वरन पूरे विश्व की नागरिकता दी है| पृथ्वी सूक्त का ऋषि कहता है-‘माता भूमि: पुत्रोडहम पृथिव्या:’ अर्थात ये समस्त धरती हमारी है और हम इसके पुत्र हैं| स्वतंत्रता के बाद देश का भूगोल बदला है,इतिहास  नहीं,आजादी के बाद से राष्ट्रीयता का प्रश्न जोर शोर से उठाया जाने लगा| बाद में हमारी राष्ट्रीयता का निर्धारण –भूभाग ,जनता और संस्कृति से किया जाने लगा | इस देश विभाजन के बावजूद हमारी सनातन संस्कृति अविच्छिन्न रही| भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखने वाले जो 6 प्रमुख कारक हैं वे क्रमश:-धर्म,दर्शन,इतिहास,कला,ज्योतिष और साहित्य हैं| धर्म का अर्थ-सनातन धर्म जिसमे किसी पंथ की बात नहीं की गयी --धृति;क्षमा दमो अस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रह:
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं |
दर्शन का अर्थ-आस्तिक और नास्तिक भारतीय दर्शन परंपरा जिसमे-चार्वाक,जैन,बौद्ध,को नास्तिक माना गया जबकि-योग,सांख्य,न्याय,वैशेषिक,वेदान्त आदि को आस्तिक दर्शन माना गया|वेदान्त और सांख्य दर्शन की ही एक विकसित परंपरा में कश्मीर के दार्शनिको ने कश्मीर शैव दर्शन की परंपरा को विक्सित किया जिसे दसवी शताब्दी में आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने भारतीय सौन्दर्य चेतना और स्वतन्त्रकालाशास्त्र के रूप में विक्सित किया| गत वर्ष ही हमने  आचार्य अभिनवगुप्त की जन्म सहस्राब्दी भी मनायी है| किसी समूह या समाज की दार्शनिक पृष्ठ भूमि कोई भी हो मतभेदों के बावजूद हम सह अस्तित्व में ही विश्वास करते हैं|
इतिहास का अर्थ है-रामायण,महाभारत,पुराण आदि|
ज्योतिष का अर्थ है-गणित,मौसम विज्ञान,पंचांग आदि|
साहित्य में –कालिदास आदि से लेकर आज तक जो कुछ उल्लेखनीय लिखा पढ़ा गया|
अत: जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो हमें संस्कृति के इन सभी आयामों पर विचार करना होता है|अर्थात हमारी कलाए हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं| आज भी ये कलाकार ही संपूर्ण जातीयता के साथ हमारी राष्ट्रीयता में शामिल हैं और ये कलाए ही हमारी राष्ट्रीय चेतना का मुख भी हैं|वो संगीत के क्षेत्र में मोहिउद्दीन डागर,बड़े गुलाम अली खा,भीमसेन जोशी,हरिप्रसाद चौरसिया,गिरिजादेवी,भूपेन हजारिका, लतामंगेशकर जी या लोक गायन में तीजनबाई  और आदरणीया मालिनी जी ही क्यों न हो-सभी कलाकार मानवीय सुख की व्याख्या करते आये हैं| चित्रकला और पेंटिंग के क्षेत्र में देखते हैं तो टैगोर बंधुओ के अलावा अमृता शेरगिल,राजा रविवर्मा,जतिन दास,शुभा मुद्गल जैसे अनेक नाम उल्लेखनीय है|वास्तु के क्षेत्र में बात करें तो हम ताजमहल की सुन्दरता को अपनी राष्ट्रीय चेतना से जोड़े बिना कैसे रह सकते हैं|दक्षिण के मंदिरों का वास्तु हमारी राष्ट्रीय चेतना का ही प्रतीक है|आज हम जिस दिल्ली में बैठे हैं उसमें  हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुकार की भावना निर्माण कला को कैसे भूल सकते है जिसने संसद भवन,राष्ट्रपति भवन जैसे भवन हमारे लिए निर्मित किये|मूर्तिकला के क्षेत्र मे अजन्ता एलोरा की गुफाओं की कृतियों से लेकर खजुराहो आदि की मूर्तियों के सौन्दर्य और उनके राष्ट्रीय महत्त्व को कैसे विस्मृत कर सकते हैं| कर्नाटक के जनकाचार्य जैसे अमर शिल्पी की कथा आज दक्षिण में किंवदंती के रूप में प्रचलित है|इसी सन्दर्भ में रामकिंकर वैज ,देवीप्रसाद राय चौधरी, शंखो चौधरी,धनराज भगत,मीरा मुखर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं| उड़ीसा के सुदर्शन पटनायक जिन्होंने समुद्र की रेत को अपना माध्यम बनाया|उनकी राष्ट्रीय चेतना पर प्रश्नचिन्ह कौन लगा सकता है| इसी प्रकार नृत्य के क्षेत्र में मल्लिका साराभाई,प.बिरजू महाराज,शोभना नारायण,उदयशंकर जी,सोनल मानसिंह आदि का नाम उल्लेखनीय है|इनके जैसे विभिन्न  कलाकार अन्यान्य कला क्षेत्रो में काम करते हुए हमारी राष्ट्रीयता के गौरव को ही नहीं अपितु  भारतीय कला वैभव को विश्वव्यापी बना कर हमारी सामासिकता को समृद्ध करने में लगे हैं|ये सभी कलाकार किसी एक जाति या पंथ के लिए काम नहीं करते वरन इनका लक्ष्य अकुंठ भाव से संपूर्ण मानवता को आह्लादित करना है|इनकी राष्ट्रीयता समग्र मानवता को समर्पित है|इनका लक्ष्य-संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसि जानताम- है| सत्ता की भाषा और विपक्ष की भाषा से ऊपर उठकर ये कलाकार संवेदनाओं की भाषा जानते है|सच्चा कलाकार समावेशी होता है,वह अपनी साधना को एकांगी नहीं रख सकता| इसके अलावा जो एक पक्ष या एक विचार लेकर चलते हैं,उनकी कुंठित मानसिकता से उपजी रचनाओं या कलाकृतियों का न तो समाज हित में कोई उपयोग होता है न राष्ट्र हित में|सच्चे साधक कलाकार समष्टि की संवेदनाओं की चिंता करते हैं, वैचारिक स्तर पर वैश्विक होते है| मुझे लगता है इन कलाओं का स्वरूप पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय है इनमे राष्ट्रीयता खोजना इन्हें संकुचित करना होगा|शिव का अर्थ है कल्याण की भावना भारतीय कलाकार सत्यं शिवं सुन्दरम का लक्ष्य लेकर जीवन और जगत की अनंत यात्रा पर निकलता है| यश,अर्थ और परमार्थ के साथ ही ये कलाकार अपने कलाकर्म से भारतीय राष्ट्रीय गौरव को सदैव बढाते रहे हैं|आधुनिक समावेशी जीवन शैली के कारण अब तकनीकि के रथ पर सवार होकर हमारी कलाए विश्व भ्रमण कर रही हैं| आज हमारे समाज में पारंपरिक लोक कलाओं का महत्व बढ़ा है| रंगोली हो या फुलकारी कला सब हमारे जीवन का अंग बन गयी हैं- डा.वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार-“‘कांगड़ा के लोटे,बुंदेलखंड के चम्मू,गुजरात के रामणदीप,घरेलू झूले,पूजा के पंचपात्र,बिच्छू,मछली,सिह,आदि आकृतियों के ताले,नर नारी मिलन के आकार वाले सरौते,पंजाब की फुलकारी,कच्छ के वस्त्रो पर कांच के चांदो की टंकाई,चंदेरी साड़ियो के दिपदिपाते झलाबोर के चौड़े पल्ले ,गुजराती पटोले,राजस्थानी बांधनू,बंगाल के बलूचर की रेशमी साड़ियाँ –इस प्रकार की अनगिनत वस्तुए युग युग से कला क्षेत्र में विक्सित होकर मानवीय जीवन को सुन्दरता प्रदान करती रही हैं|” (पृष्ठ-228- कला और संस्कृति ) आज के कलाकारों को उनकी कला का समुचित मूल्य मिले ऐसी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए| जैसे जैसे हमारे कलाकारों का विकास होगा हमारी राष्ट्रीयता और हमारी संस्कृति दुनिया में आगे बढ़ती रहेगी| हालांकि कुछ प्रगतिशील कलाकारों को अपने कौशल का उचित यश और मूल्य भी मिल रहा है|फिर भी अभी बहुत से साधक यथोचित अवसरों से वंचित हैं| कलाओं के विकास से ही हमारे देश की समावेशी जीवन शैली का विकास संभव है| अंतत: हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि हम अपने कलाकारों को सम्मान सहित कला साधना के अवसर प्रदान करें|जहां आवश्यक हो उन्हें अपेक्षित संरक्षण भी दें, क्योकि हमारी कलाएं हमारी राष्ट्रीयता की पहचान हैं| आपने हमें अपने विचार रखने के लिए यहाँ आमंत्रित किया इसके लिए'इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र' एवं 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' का  बहुत आभार|
संपर्क:
सी-45/वाई-4 ,दिलशाद गार्डन,दिल्ली-110 095


गुरुवार, 9 मार्च 2017

चंदावती :धारावाहिक (उपन्यास ) ---किश्त-एक-
#भारतेंदु मिश्र
 
 दादा की तेरहवीं

 पूरे तेरह ब्राह्मण पधार चुके थे। उनके लिए अलग चौका लगवाया गया था, नई तेरह धोती अंगौछा, जनेऊ, थालियां ,लोटे, नये पाटे, तेरह तुलसीकृत रामायण के गुटके और तेरह शंख बाजार से मंगवाए गए थे।आस-पास के क्षेत्रों से चुने हुए तेरह ब्राम्हणों को निमंत्रित किया गया था ।उनकी शक्ल तो देखते बन रही थी गोरे सुंदर चुटिया धारी पंडित चंदन टीका लगाए इस प्रकार सजे संवरे लग रहे थे कि मानो अभी सीधे सीधे स्वर्ग से ही उतर कर आए हैं ।गांव के भकुआ लोग उनको आंखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे। छोटकऊ महाराज ने पीतल के थाल में उन सभी लोगों के चरण पखारे शिव प्रसाद व चंदावती ने नये अंगौछे से सबके पैर पोछे। मोलहे ने उनको देखकर सकटू से कहा भाई – ‘देखो तो ये कितने सुघड़ पंडित आये हैं।वाह,मन करता है इनको देखते ही रहें’ ‘ हाँ मोहले भाई, भाग्य अच्छा था हनुमान दादा का यह सब सुघड़ पंडित उनके लिए स्वर्ग की सीढ़ी बनाएंगे।‘ ‘ठीक कहते हो भाई, उनको स्वर्ग अवश्य मिलेगा , देवता थे हनुमान दादा, यह सब उनके कर्मों का ही प्रताप है - बहुत बड़े आदमी थे वो। अब ब्राम्हणों के टोले में कोई उतना प्रतिष्ठित आदमी नहीं रह गया है ।‘ हम तो यह भी कहते हैं कि दो-चार-दस गांवो में उनके जैसा आदमी खोजने पर नहीं मिलेगा।  हवन का धुआँ चारों तरफ फैल गया था। पूर्णाहुति होने के बाद शंख -घंटे बजने लगे। लिपे-पुते आंगन में तेरहों ब्राह्मणों की चौकियां सजा दी गई थी। सभी देवता नवग्रह ,कुत्ता, कौआ, गाय और पंचतत्वों का भोग लगा दिया गया था। अब सभी ब्राह्मण खाने लगे थे। वाह चन्दावती दाई इतना अच्छा प्रबंध, इतना बढ़िया भोजन बहुत वर्षो बाद मिला है। हनुमान दादा की आत्मा तो तुम्हें स्वर्ग से निरख रही होगी, और तुम्हे बहुत आशीष दे रही होंगी।--- -ब्राम्हणों के मुखिया ने कहा। चन्दावती की आंखें भर आयी। अपने आंचल में मुंह छुपा लिया। अब वहां पर उपस्थित सभी स्त्री-पुरुष तरह-तरह की बातें बनाने में लगेथे । रामफल दादा दूर बरामदे में बैठे थे। वो भी मौक़ा देखकर शुरू हो गए थे और गांव के लोग उनकी बतकही सुनने लगे-- पं. रामदीन शुक्ल और हनुमान दादा तो दौलतपुर की नाक थे। उनका बड़ा पौरुष था। दस पाँच कोस तक के गांव - क्षेत्र में उनका रुतबा था। दौलतपुर के सबसे बड़े किसान थे। गांव में बस उनके घर के दरवाजे पर ही ट्रैक्टर खड़ा है।‘ दौलतपुर में लगभग पचास घर थे जिनमे -तेली , कहार , धोबी , पासी , चमार , मुराऊ ,ठाकुर , मुसलमान , सभी जातियों के घर थे। गांव में ब्राम्हणों के कुल जमा तीन घर थे। किसी ने पूछा कितनी आयु थी हनुमान दादा की? रामफल ने फिर बताना चालू किया – ‘अभी तो मुश्किल से पैंसठ की उम्र हुई होगी , हमसे तो पाँच साल छोटे रहे , बस उनका समय पूरा हो चुका था, सो चल बसे। नामी पहलवान थे हनुमान भाई। अपनी जवानी में जब वो कुश्ती लड़ने जाते थे तो हमेशा विजेता बनकर लौटते थे। दौलतपुर की असली दौलत तो हनुमान भाई ही थे। जैसे-जैसे उनका पुरुषार्थ घटता गया वैसे-वैसे उनको गठिया,बाई परेशान करने लगी थी । बहुत दिनों से बिचारे दरवाजे वाले अखाड़े पर भी नही जा पाते थे , इस बात का उन्हें बहुत अफसोस था। बेचारे तैतीस वर्ष की उम्र  में ही विधुर हो गए थे। फिर दो वर्ष बाद उन्हें चन्दावती से प्यार हो गया, साहसी थे वो , नीच जाति की होने पर भी उन्होंने चन्दावती से शादी की और फिर पत्नी का स्थान दिया और इसी प्रकार चन्दावती हर पल उनके साथ रही।यद्यपि चन्दावती उनकी जाति बिरादरी की नहीं थी, उनकी अपनी बिरादरी में बहुत बदनामी भी हुई लेकिन जब उनको प्यार हो गया था तो उन्होंने अपने जीते जी हर प्रकार से निभाया । कहाँ बीस-बिसुआ के कनौजिया पंडित और कहा चन्दावती जाति की तेलिन। उस समय चन्दावती का गौना भी नहीं हुआ था ,जब उसके पति के मौत की खबर आयी थी। चन्दावती वास्तव में चंदा ही थी। उसकी उम्र बीस से अधिक नहीं थी उस समय। जो कोई भी उसको एक बार देख लेता वो देखता ही रह जाता। गांव की रामलीला में वो सीता बनती थी। वो ज़माना ऐसा था जब ब्राम्हणो , ठाकुरों की नजर नीच जाति की बहू बेटी पर पड़ जाती तो वो जब चाहे तब उसे अपनी हवस का शिकार बना लेते थे। उस समय गरीबो के घर की स्त्रियों की कोई इज्जत नही थी , क्योकि दबंगो के उपर कोई कानून नही लागू था। चन्दावती के घर वाले चन्दावती के प्रेम से अत्यधिक प्रसन्न हुए थे। ‘देखो दादा, सौ-सौ रूपये दक्षिणा में दिए जा रहे हैं’- मोलहे ने बीच में इशारा किया। ‘रामफल ने समझाया - ये तेरहवी वाले ब्राम्हण हैं इनको दूर से ही प्रणाम करना ।उनकी नजरों से बचकर ही रहना चाहिए'सकटू पूछने लगे - क्यों दादा ?' 'तुम तो यार यकदम बौडम हो .., यहाँ आये हो तेरही खाने , सवालो की बौछार कर रहे हो. ' 'सकटू भइया तुम जरा तम्बाकू तो बनाओ - लो चुनौटी पकड़ो । अब तम्बाकू ? ...अरे अब भोजन के बाद ही तम्बाकू खाना ।‘ ' अरे तम्बाकू की महिमा तुम्हे नहीं मालूम है, तो सुनो— .
 कृष्ण चले बैकुंठ को , राधा पकड़ी बांह
यहाँ तमाखू खायलो, वहाँ तमाखू नाहि
कुछ समझ मे आया , अभी बहुत समय है तब तक तमाखू बन सकती है जब तक खानदान के मान्य लोग नही खायेंगे तब तक हमारा नम्बर कैसे आयेगा ‘ ठीक कहते हो दादा l’ कहते तो हम हमेशा ही ठीक है, पर तुम सुनते तो हो नही बस मोबाइल कान में चिपकाये रहते हो , बहरे तो हो ही जाओगे ,बनाओ ...तमाखू बनाओ l तेरहो ब्राम्हण दक्षिणा लेकर चलने लगे| महाब्राम्हण के पैर छूकर चन्दावती ने उसको पाँच सौ रुपये अलग से दक्षिणा में दिए l प्रसन्नता से उसकी आंखों में चमक आ गई और उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर आशीर्वाद दिया फिर उसके बाद अन्य तेरहो ब्राह्मणों ने भी उसी प्रकार आशीर्वाद दिए l छोटकऊ महाराज चांदी की तश्तरी में तंबाकू, पान, इलायची, लौंग लेकर आए और आगे बढ़कर सबको देकर प्रणाम करके विदा किया | दो तांगे उन सबको ले जाने के लिये पहले से तैयार खड़े थे। उन दोनों साईसों ने भी भोजन कर लिया था। उनको किराया दिया जा चुका था और घर ले जाने के लिए परुसा भी बांध दिया गया था। जब सारे ब्राह्मण तांगे पर बैठ गए महाबाभन के इशारे पर तांगे हाँक दिए गए। हनुमान दादा की तेरहवी के समय पर आये दोनों घोड़ों की भी खूब दाना - पानी -मेवा आदि से सेवा की गयी थी । वह भी खा - पीकर खूब मस्त हो गए थे। अब तो कार वाला जमाना आ गया है, परंतु ये महाबाभनों के घोड़े तो अभी तक सौ साल पुरानी परंपरा को निभा रहे है। सकटू ने पूछा , दादा! ये ससुरे महाबाभन कार , जीप में न बैठकर ताँगे में क्यों चलते है। अरे ससुरे ढकोसला बनाए है, और तो कुछ नहीं हैl इनको कोई सुख के समय नहीं बुलाता है| अब जाने भी दो यह लोग जितनी जल्दी टले वही अच्छा l महाबाँभनो की विदाई के बाद मान्य लोगों के पैर धोए गए और फिर उनको भी पाटा पर बिठाया गयाl भोजन के पत्तल में सबसे पहले कद्दू की सब्जी परोसी गई जिसमें से पुदीने की सुगंध फैल रही थीl सोठवाले आलू की भुजिया , छुहारे वाला गलका , उड़द की दाल भरी कचौड़ी -पूड़ी और इन सबके साथ किशमिश चिरौजी वाली खीर , ये सारे व्यंजन भली - भाँति पुरानी रीति के हिसाब से ही बनाये गए थे। गांव के रिवाज के हिसाब से महाबाभनों के बाद घर के मान्यो को खिलाया जाता था, इसीलिए उनके लिए पत्तले सजा दी गई थीl रामफल, सकटू , मोहले के साथ बैठे थे। गांव व् आस -पास के क्षेत्र के तमाम लोग भोजन के इंतज़ार में तख्तो पर विराजमान थे। रामफल ने चंदावती की प्रेम कहानी फिर से शुरू कर दी थी। भोजन के इंतज़ार में बैठे हुए लोगो को इस सामयिक गाथा में बड़ा आनंद आने लगा था। रामफल की आयु सत्तर वर्ष से काम नहीं रही होगी , उन्होंने अपनी आंखों से सब कुछ देखा सुना था l पुराने सरपंच थे, किसी से डरते दबते नहीं थे l गांव में उनका सम्मान था l सकटू ने तमाखू बनायीऔर रामफल की तरफ बढ़ा दी- ‘लो दादा’ रामफल ने एक मोटी चुटकी रामफल के हाथ से भर ली और उसको गदेली पर रखकर अंगूठे से घिसा | तीन बार फटकार कर झाड़ कर फिर बाएं हाथ से ओठ खोलकर दाएं हाथ की छुटकी से ओठ के नीचे रख ली- अर्थात अब पूरी गाथा सुनाने के लिए उनको पूरी खुराक मिल गई थी l फिर सकटू के मोबाइल की घंटी बजने लगी l वो अपना फोन लेकर अखाड़े की तरफ चले गये l इनका प्रेम कैसे हुआ था दादा? मोलहे ने पूछा- किसको किससे कब मोहब्बत हो जाए इसका तो कुछ पता नहीं, यह तो दिल लगे का सौदा है। क्या पता कहाँ किस समय कौन मन को भा जाए , अच्छा लगने का कोई एक कारण नहीं होता बौड़मदास! कहां बीस बिसुआ के कनौजिया हनुमान महाराज और कहां तेलिन की विधवा बेटी चंदो- मोहब्बत हो गई l.. रावण और सीता के प्रेम की चर्चा बहुत दिनों तक होती रही l ‘यह सब किस प्रकार से हुआ l गांव में तो हम इनके तरह - तरह के किस्से सुनते रहे है – लेकिन आपने तो सबकुछ अपनी आँखों से देखा होगा l...’ ‘क्यों नहीं हमीं ने तो फैसला किया था l’ ‘किस बात का फैसला?’ अरे कई महीनों तक तो चोरी छिपे ये मोहब्बत चलती रही l जब ब्राम्हणों के मोहल्ले में खुसर - फुसुर बहुत होने लगी तो एक दिन छोटकऊ महाराज हमारे पास आए और कहने लगे - दादा अब तो आप ही कुछ कीजिए क्योंकि अब पानी सिर के ऊपर निकल गया है l हमने पूछा – ‘क्या हुआ?’ आप से क्या छुपा है सरपंच दादा,.... उस समय भी मैं ही सरपंच था| छोटकऊ बोले—‘ दद्दू उस तेलिनया चंदावती पर फिदा हो गए हैं l जाति- बिरादरी में सब मान- मर्यादा मिट चुकी है l अब तो घर और खेत के बँटवारे का समय आ गया है l अब आप ही हमको बचा सकते है दादा ------ हम पंचायत बुलाना चाहते हैl’ छोटकऊ! आखिर तुम चाहते क्या हो यह तो बताओ’ ‘ हम चाहते हैं कि हमारे परिवार पर उनकी इस निगोड़ी मुहब्बत का बेजा असर न पड़े। खेती न बटे, दद्दु के आगे पीछे तो कोई है नहीं l कहीं उस तेलिनिया के चक्कर में हमारा घर -खेत सब कुछ न बंट जाए l ठीक कहते हो भैया! , कोशिश किया जाए कि ऐसी नौबत न आवे l  फिर क्या हुआ? फिर हमने ही फैसला किया कि हनुमान और चंद्रावती ब्याह करके इसी घर में रहें l चंद्रावती के घरवाले चाहते थे कि हनुमान और चंद्रावती अलग उनके मोहल्ले में रहे l ब्राम्हणों के मोहल्ले के कुछ बदतमीज़ लोग भी यही चाहते थे कि इन लोगों का आपस में बटवारा हो तो उनकी ताकत कुछ कम हो जाएl हमने यह सब हाल देख सुनकर समय के अनुसार सही सही फैसला किया कि हनुमान दादा और चंदावती व्याह करके इसी घर में एक ही साथ रहेंगे ,बस अपनी रसोई अलग कर लेंगे l छोटकऊ या उनके बेटे या पत्नी को किसी प्रकार का ऐतराज नहीं होना चाहिए , यदि कोई एतराज होगा तो घर का बटवारा होगा और जब घर का बटवारा होगा तो फिर खेती का भी बंटवारा हो सकता है l हांलाकि उनके पिताजी ने पहले से ही खेती दोनों भाइयों के नाम करा दी थी जिससे कि दोनों मे लड़ाई - झगड़ा न हो l हनुमान और छोटकऊ दोनों ने उस समय इस फैसले को स्वीकार कर लिया था । ब्राम्हणटोला के बहुत लोग इनसे नाराज थे ख़ास कर इस शादी के कारण। क्षेत्र के ब्राम्हणों में आज भी इनके खानदान का कोई सम्मान नहीं रह गया है। इनके पास अच्छा ख़ासा पैसा है,रुतबा है लेकिन इस घटना के बाद बीस बिसुआ वाले ब्राम्हणों के यहाँ से इनकी रिश्तेदारी नहीं हो पायी। अब तो बात बहुत पुरानी हो गयी है । तभी सकटू ने संकेत किया की देखो मान्य लोग भोजन कर चुके है। इसी समय छोटकऊ महाराज ने रामफल दादा के पास आकर कहा दादा , चलिए आप भी भोजन कर लीजिये !, ‘चलो सकटू भाई तुम भी चलो।‘ ‘चलो भाई, चलो भूख तो बड़ी जोर की लगी है। सकटू , मोलहे ,रामफल ,शंकर , गनी मियां सब भोजन करने के लिए आगे बढ़ गए ।भोजन बहुत ही स्वादिष्ट बना था इसलिए सब लोगों ने भरपेट अच्छे मन से खाया। खाने के बाद पान सुपारी का प्रबंध किया गया था।
गांव में ठाकुर रामफल का सभी लोग सम्मान करते थे । चौसठ - भोला छाप तम्बाकू वाला पान खाकर जब ठाकुर साहब चलने लगे तब छोटकऊ ने कहा – प्रधान दादा , अब दद्दू तो चले गए,उनके साथ ही इस तेलिनिया का सम्बन्ध ख़त्म हो गया। किसी ज़माने में आपने ही यह ब्याह करवाया था , अब जब दद्दू नहीं रहे तो इस तेलिन को हम अपने घर में कैसे रहने दे सकते है ? 'भाई जो तुम्हारी समझ में आये वही करो लेकिन अब जमाना बहुत बदल गया है। इस ज़माने में औरतो , लड़कियों की बातो को थाने में बड़े ध्यान से सुना जाता है। बहन जी का शासन है कही लेने के देने न पड जाय| नेता , ऑफिसर सब नीची जाति के है। कही जेल की हवा न खानी पड़ जाय।' ' अब जो होगा वो देख लेंगे। पहले तो दादा की शर्म थी, अब जब वही नहीं है तो इस ससुरी को घर में कौन रखेगा। अब तेरहवी के साथ - साथ सारे कार्य निपट गए। बस कल इस तेलिन को घर से भगाएंगे तभी घर पवित्र होगा बाकि तुम लोगो का सहयोग तो मिलेगा ही.... ? ‘भईया ! हम सहयोग का वादा तो नहीं कर पाएंगे। पहले अपने मोहल्ले में आस पड़ोस में सबकी राय- सलाह कर लीजिए। हम तो लखनऊ जा रहे हैं। चार दिन डी एम साहब के साथ एक सम्मलेन में रहना है। हम इस काम में तुम्हारे साथ नहीं है। ' ‘क्यों दादा ?’ ‘भाई! बात यह है कि हमने ही तो यह फैसला किया था कि चन्दावती हनुमान भईया के साथ उसी घर में रहेंगी। अब जब हनुमान भाई नहीं रहे तो किस मुँह से हम यह बात कहे की चन्दावती को घर से निकाल दिया जाए। गांव की औरते आदमी सब उसके साथ खड़े हो जायेंगे। सबके साथ उसका व्यवहार बहुत अच्छा है। पहले खुद भली - भाँति  सोच - विचार लो फिर जो समझ में आये जैसा मन हो करना। अब हम जा रहे है। कल सबेरे हमें लखनऊ जाना है। 'ठीक है दादा राम - राम ‘ रामफल चले गए। धीरे - धीरे खास रिश्तेदार के अलावा सब अपने - अपने घर चले गए। फतेहपुर वाले जीजा , कानपूर वाले मामा , सकटू और मोलहे वही छप्पर के नीचे कोटपीस (ताश)खेलने लगे। नाती - पोते बहुएँ बेटियो से सारा घर भर गया था। आसपास के सब लोग चले गए थे लेकिन तब भी घर में चहल - पहल थी। चन्दावती रिश्तेदारो से दूर ही रहती थी , क्योकि सब लोगो को जाति बिरादरी के मामले में चन्दावती की जाति के अलावा उसका रूप - गुण व सद्व्यवहार आदि कुछ भी नजर नहीं आता था।सब उसके व्यवहार को नीच जाति के हिसाब से ही जांचते परखते थे| अब तो चन्दावती ने अपने अकेलेपन के कारण दुःख से निढ़ाल होकर चारपाई पकड़ ली थी। अपने समय की सुंदरी चन्दावती ने अपने बाल कटवा डाले थे; उसकी कलाइयां सूनी हो गई थी, उसकी मांग का सिंदूर उजड़ गया था। उसके माथे पर चमचम चमकती बिंदी गायब हो गई थी। हालांकि उसके सूने माथे पर बिंदी की जगह साफ़ अब भी झलक रही थी। आखिर इस घर में उसका था ही कौन? अब तो उस घर में चन्दावती का हाल पूछने वाला कोई भी नहीं था। चन्दावती अब अपने भाई - भाभी के साथ भी नहीं रहना चाहती थी। लेकिन उसका और कहीं ठिकाना भी नहीं था। हनुमान दादा जब से बीमार हुए थे तब से चन्दावती सबके व्यंगबाण सुनते-सुनते पक गई थी। जब तक हनुमान दादा जिंदा रहे तब तक चन्दावती के मुंह पर कोई भी किसी भी प्रकार की गलत - सलत बात कहने का साहस नहीं करता था। हालांकि घरवालों ने उसका नाम चन्दो चाची रख दिया था। पहले तो बड़े लोग दबी जुबान से उसे चन्दो - चन्दो कहते थे पर अब तो घर के छोटे- छोटे बच्चे तक उसे चन्दो कहने लगे थे। परंतु चन्दावती अपने दुख में ये सब अपमान की बातें भूल गई थी । जब एक माह पहले हनुमान दादा को मियादी बुखार चढ़ गया था तब से उनके अंतिम समय तक चन्दावती ने एक पैर पर खड़े होकर उनकी सेवा की थी। बैंक में जो तीस हजार रूपया जमा था वह सब उनकी बीमारी में उड़ गया था। जब दस - बारह दिनो तक उनका बुखार नहीं उतरा तो गांव के डॉक्टर ने उन्हें लखनऊ ले जाने की सलाह दी। चंद्रावती ने अपने गले की जंजीर व कानों के झुमके बेचकर उनका इलाज करवाया। लखनऊ के पी.जी.आई. हॉस्पिटल का खर्च बहुत अधिक था। बुखार तो हनुमान दादा के दिमाग में चढ़ गया था। अंत में वहां के डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया। अब जब वो बेसहारा हो गयी तब उसको अपनी ज़िंदगी बोझ लगने लगी। छोटकऊ तो इन तीस सालो से चन्दावती से अपनी दुश्मनी निभाते चले आ रहे थे। वो तो मन ही मन में हनुमान दादा के मरने का इंतज़ार ही कर रहे थे।जब तक हनुमान दादा सुनने समझने लायक थे,तब तक दिखावटी लल्लो चप्पो करते रहे| जैसे - जैसे उनकी तबियत बिगड़ती गयी , वैसे - वैसे छोटकऊ महाराज उनसे दूर होते गये। चन्दावती के पास अब कुछ भी नहीं बचा था। ब्राम्हणों -टोले वालो के अलावा दूसरी बिरादरी के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे। क्योकि दूसरी बिरादरी के लोग उसे शुक्लाइन समझ कर पैलगी(प्रणाम) करते थे। परंतु ब्राम्हणों ने उसका नाम चन्दो चाण्डालिन रख दिया था। उसकी जाति के ही कारण कुछ लोग इस प्रकार उसकी बेइज्जती करते थे। पर दूसरी (पिछड़ी ) जाति के लोग तो उसको शुक्लाइन ही कहते थे। और प्रणाम भी करते थे। गाँवो में नाम बिगाड़ने की परंपरा चलती है।उसी में दूषित मानसिकता वाले लोगो को आनंद आता है। एक बार हनुमान दादा ने बताया था कि नाम बिगाड़ने की परंपरा तो महाभारत के समय से चली आ रही है। कौरव दुर्योधन को दुर्योधन कहते थे परंतु पांडवों ने उसका नाम सुयोधन रखा था। क्योंकि पांडव उसको सुयोधन कहकर पुकारते थे और चिढ़ाते थे। कहते थे - जब हम चाहे तुम्हें जीत लेंगे क्योंकि सुयोधन का मतलब है जिसको बड़ी आसानी से जीता जा सके। दौलतपुर में इस तरह से उल्टा-पुल्टा नाम रखने वाले बहुत लोग थे जिनके पास बस इसी तरह के काम थे। पहले के दिनों में गरमियो में नीम की छाँव तले और जाडों में अलाव के पास बैठकर इसी तरह की बाते होती रहती थी, परंतु अब टेलीविजन आ जाने के बाद से इस तरह की बैठकी में कुछ कमी जरूर आ गयी है।
 शाम होते-होते ज्यादातर रिश्तेदार चले गये। अब सड़कें बन गई हैं तो आने जाने के साधन हर समय उपलब्ध रहते हैं| लेकिन छोटकऊ को तो चैन भी न पड़ी। हनुमान दादा का कमरा और बरामदा तो पहले से ही अलग था। बस थोड़ी सी झपकी ही आयी थी कि छोटकऊ बरामदे में लेटी हुई चन्दावती के पास पहुँच गए और कहने लगे- ‘तेलिन भौजी ! बहुत दिन हमारे घर में सो चुकी हो , अब जो तुमको इस घर में लाये थे वो तो चल गए। अब तुम अपने रास्ते जाओ।‘ चन्दावती को इस बात का अंदेशा तो पहले से ही था पर यह सब इतनी जल्दी होगा ऐसी आशा बिलकुल न थी। चन्दावती उठ कर बैठ गई चारपाई के नीचे रखे हुए लोटे में से दो घूंट पानी पिया, फिर पूछा – ‘क्या बात है छोटकऊ?.अब तो तुम्हारे दद्दू के साथ इसी घर में रहते हुए तीस साल हो गये है , अब क्या हो गया ? तीस साल पुराना फैसला तुम्हारे मिटाने से मिट जायगा ?... अभी सरपंच रामफल दादा मरे नहीं है उन्होंने ही हमारी शादी करवायी थी। घर में रहने का फैसला भी उन्होंने ही किया था।‘ 'अब जब दादा नहीं रहे तब वो शादी ..वो फैसला सब अपने आप खत्म हो गया। ' ‘तुम कौन होते हो भैया - फैसला ख़तम करने वाले। गाँव में पञ्च है प्रधान है वही लोग फैसला करेंगे।‘ ‘फैसला जब तक होगा तब तक शिवप्रसाद तुम्हारी क्या गति बना देगा , इसका अंदाज तो तुमको बिलकुल भी नहीं है। हम तो तुम्हारा भला चाहते है इसीलिए समझ रहे है। शिवप्रसाद तो अभी ..तत्काल तुमको घर से बाहर करने की ज़िद्द पर अड़ा है। तुम यदि अपनी इज्जत बचाना चाहती हो तो कल सबेरे इस घर में दिखाई न देना। रात में दरवाजा बंद करके ही सोना। हमारा फर्ज था सो तुम्हे समझा दिया है। बाकी जो तुम्हारी समझ में आये वो करो।  छोटकऊ चले गए। चन्दावती की आँखों से नींद उड़न छू हो गयी थी। वह डर गयी थी। झटपट बरामदे से उठकर कमरे के अंदर चली गई। इस समय तो उसे स्वयं सहारे की आवश्यकता थी। जिसके सहारे उसने अपना पूरा जीवन व्यतीत कर दिया था, वही इस वृद्ध अवस्था में धोखा देकर भगवान के पास चला गया था। अब तो चन्दावती का जीवन एक कटी पतंग की भांति हो गया था। जब तक हनुमान दादा जीवित थे, तब तक उनके फैसले के सामने किसी प्रकार टीका टिप्पणी करने की छोटकऊ की कभी हिम्मत नहीं पडी थी। हमेशा सिर झुकाकर ठीक है दादा कहने वाले छोटकऊ के विनीत स्वभाव की चन्दावती की आदत हो गई थी। तीस वर्ष पहले जब चन्दावती इस घर में आई थी तब हनुमान दादा ने समझाया था कि पति पत्नी के बीच में कोई तीसरा न आने पाए तो जीवन रूपी गाड़ी भली प्रकार आगे बढ़ती जाती है। अब एक - एक बात चन्दावती की आँखों के सामने चलचित्र की भाँति चमकने लगी। एक बार हनुमान दादा ने चन्दावती को बताया था कि भगवान राम और सीता माता के बीच बड़ी गहरी समझदारी थी। तुलसीदास जी ने कहा है –
जल को गए लक्खन है लरिका ,परिखौ पिय छांह घरीक हुइ ठाढ़े।
 पोछि पसेऊ बयारि करौ , अरु पाय पखारिहौ भूभुरि डाढे।
 तुलसी रघुवीर प्रिया स्रम जानिकै , बैठि बिलम्ब लौ कंटक काढ़े
 जानकी नाह को नेह लख्यो , पुलकयो तनु वारि विलोचन बाढ़े।
 अर्थात जब राम जी वन को चलने लगे तो सीता जी ने कहा कि - स्वामी हम भी चलेंगे। तब श्री राम ने उन्हें बहुत समझाया की वन के ऊबड़ - खाबड़ मार्ग में तुम नहीं चल पाओगी परंतु तब भी वे मानी नहीं। रास्ते में जब सीता जी थक जाती थी तब राम को पता चल जाता था की इस समय सीता थकी हुई है। सबसे विशेष बात तो यह थी की राम ने सीता से कभी यह नहीं कहा की तुमने हठ क्यों की थी?राम ने कभी उन्हें चिढ़ाया नहीं कि अब लो मौज करो। बस राम तो सीता के मन की बात समझ जाते और चुपचाप किसी वृक्ष की छाया में बैठकर सुस्ताने लगते थे। इस कविता में सीता कहती है - प्रिय , घडी भर किसी वृक्ष की छाया में खड़े हो कर प्रतीक्षा कर लीजिये , क्योकि लक्ष्मण अभी छोटे है और वो पानी लेने गए है। जब तक वो आते है तब तक लाओ तुम्हारा पसीना पोछ दूँ। और अंगौछे से तुम्हे हवा कर दूँ| गलियारे की गरम - गरम धूल में तो तुम्हारे पैर जल गए होंगे पानी आ जाये तो आपके पाँव धो दूँ। ऐसी बाते सुनकर राम अपनी प्राणप्रिया सीता के मन की बात समझ गए कि वास्तव में सीता स्वयं ही थक गयी है ,तब राम ने तो उनसे कुछ नहीं कहा बस चुपचाप अपने पाँव के काँटे निकालने लगे. राम जब पाँव के कंटक निकालने के बहाने बैठ गए और देर तक काँटा निकालने के बहाने बैठे रहे। तो सीता भी उनके मन कि बात समझ गयी। वो समझ गयी की उनके प्रियतम उनके प्रेम के वशीभूत हो रहे है , उन्हें विश्राम कराने के लिए देर लगा रहे है|और बिना किसी प्रकार की बातचीत के वो चुपचाप बैठे है। यह सोचकर हर्षातिरेक से सीता के शरीर में सुरसुरी सी दौड गयी , पूरा शरीर रोमांचित हो गया था। इस प्रसंग के स्मरण होने से चन्दावती की आंखें फिर डबडबा गई, और आँखों से आंसुओ की धार बहने लगी। वह आगे सोचने लगी कि - अभी उनको मरे कुल तेरह दिन ही बीते है और छोटकऊ ने अपना असली रंग दिखा ही दिया। मानो वो इसी दिन का इंतज़ार कर रहे थे। सीता हो या मीरा इस संसार में प्रत्येक स्त्री को परिक्षा देनी ही पड़ती है| जिसका पति नहीं रहता उसका कोई सम्मान नहीं होता। औरत तो आदमी की छाया मानी जाती है|आदमी ख़तम तो औरत जीते जी अपने आप ख़त्म हो जाती है। विधवा का जीवन तो अपराधिनी की भाति ही कटता है। देखो अब मेरे भाग्य में क्या लिखा है। लेकिन छोटकऊ जो अपनी मनमानी करने पर उतारू है और शिवप्रसाद को हमें घर से निकलने के लिए तैयार किया है , इस समस्या से किसप्रकार निपटा जा सकता है। इसी बात का सोच - विचार करते - करते चारपाई पर पड़े - पड़े चन्दावती को झपकी लग गयी और वह सो गयी। रात के घने अन्धकार की कालिमा चारो ओऱ फैल गयी थी।