रविवार, 30 अक्तूबर 2016

लेखक बनने के लिए

पं.अमृतलाल नागर से भेंटवार्ता
(वर्ष 1986 मे नागर जी से की गयी मुलाकत के अंश)
पुराने लखनऊ मे चौक मुहल्ले का अलग स्थान है।एक ओर बडा इमामबाडा ,भूलभुलौया,गोलदरवाजा,घण्टाघर मेडिकल कालेज आदि प्रसिद्ध इमारतें तो दूसरी ओर भांग ठंडाई वालो की पुरानी दूकाने यहां की गलियो में कहीं बेले की माला बेचने वाले बरबस आपके गले मे माला डाल देंगे तो कहीं वेश्याओ के उजडे हुए कोठे सुनसान दिखाई पडेंगे।आसपास ही आप आप की भाषा मे हंसी मजाक करते हुए लोग भी मिल जाएंगे।यहीं एक गली में थोडी दूर चलकर ही एक भव्य कोठी है।जिसके दृढ और विशाल कपाटों को देखकर ही उसकी प्राचीनता और भव्यता का प्रमाण मिल जाता है।इसी मे प्रसिद्ध सिने अभिनेता शशिकपूर ने अपनी फिल्म जुनून का छायांकन किया था।यही कोठी प्रख्यात कथाकार उपन्यासकार पं.अमृतलाल नागर जी का निवास स्थान रहा है।इधर का इलाका आरम्भ से ही रंगीनियो का और मस्तियो का इलाका रहा है।
यह मुलाकात सन 1986 मे की गयी थी।उनदिनो बाबू जी अस्वस्थ चल रहे थे।यद्यपि उस समय उनकी दृष्टि और श्रवण शक्ति कमजोर हो रही थी किंतु उनकी सर्जनात्मक शक्ति एवं चिंतनजन्य आनन्द उन्हे सतत कुछ नया देने के लिए संकल्पबद्ध करता जाता था।तभी उनसे लखनऊ यात्रा मे युवारचनाकार मंच की ओर से नवलेखन पर की गयी एक मुलाकात के कुछ अंश-
भा.मि.-उपन्यासों के प्रचार प्रसार और विस्तार के आगे नाटको का विस्तार कम हो गया है,जबकि पहले नाटक मे ही उपन्यास के सारे तत्व मिल जाया करते थे।आपकी दृष्टि में इसका मुख्य कारण क्या है?
नागर जी-
नाटक की परंपरा भारत मे बाहरी आक्रमणो के कारण समाप्त हो गयी।पहले वही खेले जाते थे तब उन्ही का विस्तार भी था।नाटक बडी व्यवस्था चाहता है।उपन्यास को केवल पाठक चाहिए।संस्कृत मे कादम्बरी उपन्यास है।दशकुमारचरित,कथासरितसागर,हितोपदेश आदि मे कहानियां हैं।संकृत मे कथा लेखन काफी विस्तार मे मिलता है-नाटको का तो है ही।आधुनिक काल में हिन्दी मे नाटक तो प्रारंभ हुए परंतु कुछ परिस्थितियां ऐसी हुईं कि हमारे देश में हिन्दी का पेशेवर रंगमंच नही बना।शौकिया रंगमंच बाबू भारतेन्दु आदि ने शुरू किया लेकिन महाराष्ट्र मे आज भी रंगमंच है।परंतु वह हिन्दी से नही विकसित हुआ।वह व्यवस्थित है ,इसीलिए वहां थियेटर चलते हैं।रंगमंच की दृष्टि से इतनी प्रौढता भारत में कहीं भी नही आयी कि केवल नाटक ही देखे जायें यदि ऐसा होता तो शायद उपन्यास कम पढे जाते।नाटक पढने के लिए नही लिखे जाते।दूरदर्शन रेडियो आदि पर कितनी खपत हो सकती है।अत: उपन्यास विधा आगे आयी और यह विधा विस्तृत होती गयी।निराला जी भी नाटक लिखना और मंचन करना चाहते थे।एक संस्था भी बनी किंतु कुछ हुआ नही।
भा.मि.-
आपके द्वारा आनूदित विष्णुभट्ट कृत ‘मांझा प्रवास’का हिन्दी अनुवाद ‘आंखों देखा गदर’नवभारत टाइम्स दैनिक मे छपा।देश मे इसप्रकार का जीवंत इतिहास विभिन्न भाषाओ मे बिखरा पडा होगा।फिर हिन्दी के रचनाकारो की दृष्टि इस ओर क्यो नही पडती?
नागर जी-
हमारे यहां दिक्कत ये है कि पिछले कुछ वर्षो में साहित्य के किसी भी पक्ष उपन्यास हो या कविता किसी विधा की उचित समीक्षा नही मिलती है।हिन्दी के बुद्धिजीवियो मे भी यह कमी है कि वह जीवंत इतिहास को पहचानने की ललक नही रखता।फिरभी दृष्टि ही न जाती तो गदर के फूल कैसे लिखता मैं।हम अंग्रेजी के माद्ध्यम से ही अन्य भारतीय भाषाओ को पढते हैं।यदि उसी भाषा मे पढे तो अच्छा हो बिना भाषा को समझे उस भाषा के साहित्य को समझा तो जा सकता है परंतु अनुभव की तरलता और संवेदनाओ का स्पर्श नही किया जा सकता।यह परिश्रम हर व्यक्ति के बस का नही है।इसीलिए नवलेखन मे मौलिकता का प्राय: अभाव सा दिखता है।
भा.मि.-
इधर भाषा के आधार पर रचनाकारो में प्रांतीयता या क्षेत्रीयता ही अधिक देखने को मिल रही है।हिन्दी के लोग हिन्दी भाषी प्रांतो तक ही जाने माने जाते हैं।हिन्दी के रचनाकार अहिन्दी भाषी प्रांतो मे जनमे महापुरुषो तथा उनके आदर्शो पर क्यो नही लिखते? जबकि रचनाकार तो वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा मे ही जीता है?
नागर जी-दक्षिण भारत या अन्य क्षेत्रो से जुडे लोगो के बारे मे कहा है(लिखा है)पर वह कम है।यह कमी तो हमारे बुद्धिजीवी की ही है।दूसरी ओर यह जागरूकता का प्रश्न है।रवीन्द्र जी के साहित्य में ...कंचन...की बात है जो जागरूक साहित्यकार होता है वह इन सब बातो का ध्यान रखता है।भाषा का विरोध राजनैतिक स्तर पर है।मै 1945 मे मद्रास गया था।वहां शिक्षक रखकर मैने तमिल सीखी।वहां भी लोग हिन्दी पढते और सीखते हैं इसके अतिरिक्त अध्ययन प्रवास और पर्यटन भी आवश्यक है।समंवय की दृष्टि लाने के लिए यह आवश्यक है।वस्तुत:रचनात्मक कार्य के लिए यह आवश्यक नही कि किसी क्षेत्र विशेष या व्यक्तिविशेष के लिए आग्रह हो।कहानी मानव की है आप यह कह सकते हैं लेखन मे आज उस तरह की स्फूर्ति नही  है।आज लेखक के संघर्ष हैं उसकी समस्या जीविकोपार्जन है।अत: वह जिज्ञासा को जागृत भी नही कर पाता भारत ही क्या विश्व की बात का पता भी और वहां के आदर्शो का चित्रण होना चाहिए।आवश्यक मात्रा आदिसे बचने के लिए हमे सीमित रह जाना पडता है।
भा.मि.-
करवटें उपन्यास के बाद आपने इधर कुछ नया शुरू किया था।उसके बारे मे कुछ बतलाइए?
नागर जी-करवटें मे 1850 से 1902 तक का एक ऐतिहासिक कालखण्ड है।इस नई कृति में 1902 से अ986 यानी आजतक की बात कहना लक्ष्य है।बीसवीं सदी के अंग्रेजी पढे लिखे मध्यवर्गीय समाज की समस्याओ को हमने इसमे लिया है।शीर्षक बाद मे रखेंगे।इधर हमारी दृष्टि भी शिथिल हो रही है।श्रवण शक्ति तो पहले से ही कमजोर है।बिना पढे तो कुछ लिखा ही नही जा सकता।अभी तक चौथाई कार्य ही हुआ है।धीरे धीरे प्रयास चल रहा है।
भा.मि.-गद्यलेखन में विशेषत: कथात्मक लेखन के लिए आपकी दृष्टि मे कौन सी बातो का ध्यान रखना आवश्यक है?
नागर जी-
संस्कृत मे एक उक्ति है-जिसका अर्थ है-देशाटन राजदरबार, वेश्या का घर,हाट इन सबको घूमे बिना कोई कवि या लेखक नही बन सकता।मै मेहतओ के पीछे घूंमा हूं।कोठो पर गया हूं।पर्यटन किया है।दस प्रतिशत प्रतिभा और नब्बे प्रतिशत श्रम लेखक को अच्छा लेखक बनाता है।हिन्दी मे प्रतिभा की कमी नही है।दिशा की कमी है।जमीन पर पैर नही रक्खा ब्रम्ह की बात करने लगे।संस्कृति लचीली होती है जो जडता नही सिखाती।जंहा जडता है वहां प्रगति कैसे संभव है।समय को पहचानिए समय के साथ चलिए।तब तो कुछ बात बनेगी।
प्रस्तुति :भारतेंदु मिश्र  







भरतकालीन कलाएं:-
भारतीय सौन्दर्य दर्शन और कला चेतना /चिंतन से जुड़े मित्रो को सूचनार्थ -
संगीत नाटक अकादमी -द्वारा आचार्य अभिनवगुप्त सहस्राब्दी वर्ष -2016 में प्रकाशित मेरी पुस्तक का आवरण अब ये पुस्तक संगीत नाटक अकादमी ,रवीन्द्र भवन ,नई दिल्ली के काउंटर से खरीदी जा सकती है| 


मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं--
मोहनराकेशऔरधर्मवीरभारती जैसे लेखको के रचनाकर्म को नईअर्थवत्ता प्रदान करने वाले ,हिन्दी रंगमंच में प्राण फूंकने वाले इब्राहिम अलकाजी को जन्मदिन की शुभकामनाएं|उनका रंगकर्म लगातार हमें सीखने की प्रेरणा देता है|
अलकाजी का जन्म18 अक्तूबर 1925 पुणे में हुआ था. उनके पिता सऊदी अरब के कारोबारी थे. उनकी मां कुवैत की थीं
नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, "अलकाजी के रुप में मुझे प्रेरित करने वाला टीचर मिला. वो मुझे पसंद करते थे और मेरा हौसला बढ़ाते थे. वो कठिन मेहनत कराते थे ताकि मेरी क्षमताओं का विकास हो सके."
अलकाजी का एनएसडी में पहला नाटक मोहन राकेश का 'आषाढ़ का एक दिन' था. इस नाटक में मुख्य भूमिका ओम शिवपुरी और सुधा शिवपुरी ने निभाई थी.
इसके बाद उन्होंने धरमवीर भारती के नाटक 'अंधायुग' का फिरोजशाह कोटला में मंचन किया. तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी नाटक देखने गए थे. उन्होंने पुराना किला में गिरीश कर्नाड के नाटक तुगलक़ का मंचन किया.
1977 में उन्होंने एनएसडी के निदेशक का पद छोड़ दिया. उसके बाद वो रंगमंच से भी एक तरह से दूर हो गए. 1990 के दशक में उन्होंने थोड़े समय के लिए रंगमंच पर वापसी की और एनएसडी में तीन नाटकों का निर्देशन किया.
करन थापर को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "मैं चाहूंगा कि लोग मुझे मेरे समूचे रंगकर्म के लिए याद करें, न कि केवल एनएसडी के मेरे कार्यकाल के लिए."

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016


नया नाटक--

          #1 #
साथ पढेंगे साथ बढ़ेंगे

(शिक्षा विभाग में बच्चो द्वारा मंचित पुरस्कृत नाटक )
(एक विद्यालय के दो बच्चे एक साथ एक ही मोहल्ले से मेट्रो पकड़कर स्कूल आते जाते हैं| एक लड़का है और एक लड़की| स्थान दिल्ली: कश्मीरी गेट के पास का स्कूल| सीन: स्कूल  की छुट्टी-हो गयी है| )
राहुल: चल नीलू...चल..नहीं तो 2.05 वाली मेट्रो निकल जायेगी|
नीलू: निकल जाने दे ...मुझे भूख  लग  रही है... 
राहुल:.. चल, कश्मीरी गेट ..मैकडी में बर्गर खाते हैं |
नीलू; .. ठीक है..चल|
(कश्मीरी गेट मेट्रोस्टेशन - मैकडी का सीन )
राहुल: भाई! दो बर्गर ....
(दोनों बर्गर खाते है इसी बीच नीलू के पड़ोस के अंकल चौधरी उन्हें हँसते बतियाते देख लेते है| )
चौधरी: ओ.. तेरी की ..या तो अपने शर्मा की छोरी से|..छोरे के साथ ..बिगड़ गयी| चल भई ,एक फोटू खींच लेते हैं |
(चौधरी फोन पर शर्मा को बताता है)
चौधरी: शर्मा!..भई ..तेरी छोरी बिगड़ गयी...
शर्मा: क्या हुआ चौधरी साहब..
चौधरी: भई ,तेरी छोरी कश्मीरी गेट में एक छोरे के साथ मस्ती कर रही है|
शर्मा: क्या  कह रहे हो..हमारी  नीलू ऐसी ना है|तुझे कोई  गलतफहमी हुई होगी|
चौधरी: भई , तू चिंता  न  कर ,मन्ने  फोटू खींच  ली है| शाम को दिखाता हूँ |
(राहुल नीलू का मेट्रो से उतर कर हाथ मिलाकर अपने अपने घर की और रवाना हो जाते हैं )
नीलू की माँ : ...आ गयी छोरी..
नीलू: ..ले बैग धर दे..(माँ के गोद में बैग रख देती है )
नीलू की माँ: थक गयी छोरी...चला  हाँथ  मुह  धो  ले..खाना खा ले|
नीलू: सब्जी  क्या बनायी है ?
नीलू की माँ: घिया की ...
नीलू : छि...मुझे भूख  नहीं है..
(फोन  की घंटी..)
नीलू: हेलो! राहुल!
राहुल: हाँ बोल!..यार मेरी कापी तेरे बैग में चली गयी है..मेरा होम वर्क कर देना..मै क्यों..करूंगी ?..चल चल| अच्छा कल याद से कापी लेती  आना|
नीलू: देख याद रहेगा तो ले आऊँगी...बाय|
(शर्मा जी कुछ गुस्से में आते हैं )
शर्मा: नीलू!....ए नीलू!..ये किससे बात कर रही है ?
नीलू:  दोस्त  है पापा!
शर्मा: के नाम  है?
नीलू: राहुल!...
शर्मा: तेरी शिकायत मिली है..तू पढ्न खातिर जा रही है कि दोस्त बनान वास्ते सकूल जा रही है?..अभी चौधरी से मिल के आता हूँ ..फिर तेरी खबर लेता हूँ |
(चौधरी के घर )
चौधरी: आ भई ,शर्मा ! देख मै तेरी छोरी को पहचानूं ,..मन्ने सोची कि तुझे खबर करना जरूरी सै |
शर्मा: दिखा भई !(मोबाइल में फोटो देखकर )..ओ बावली पूछ ..या तो म्हारी छोरी से| बहुत ठीक करा तू ने| इबा इसकी खबर लेता हूँ|
चौधरी: भई ,मै तो अपनी छोरी ने घर ते बाहर न निकडन दिया| बारहवी तक प्राइवेट पढाई कराई, फिर ब्याह करा के अपने घर भेज दई |
शर्मा: ठीक कह रहे हो चौधरी साब! ...अब जान दो ..थारी बड़ी मेहेरबानी|
चौधरी: भई मन्ने छोटा  मत न बना ,जे क्या बात है..थारी छोरी ,म्हारी छोरी..जे तो म्हारो फर्ज से|
शर्मा: ठीक है भाई,इब चलूँ |
चौधरी: थोड़ा छोरी ने टाईट  करा दे|..छोरे का पता कर..कौन का है ?
शर्मा: ठीक  है.. नमस्कार|
(शर्मा घर आकर..)
शर्मा: नीलू!..ओ री नीलू...कहाँ मर गयी ?
नीलू: जी पापा..
शर्मा: इधर आ तू..(कान खींचते हुए..थप्पड़ मारकर..) जे छोरा कौन से ?
नीलू: राहुल|...हमारे साथ पढ़ता है|
शर्मा: जे पढाई हो रही है..कश्मीरी गेट के होटल में ..अरी कहाँ मर गयी ..भागवान!.. गयी भैस पानी में..
 नीलू की माँ: कि होया ?
शर्मा: पूरे मोहल्ले में नाक कटवायेगी  या छोरी|.. तू ध्यान  न  रख सके है?...कल मेरे साथ सकूल चलेगी| सुसरे छोरे को वही ठोंकता हूँ |
(प्रधानाचार्य का कमरा )
शर्मा: आप के पढाओ हो ?..या म्हारी छोरी किसी छोरे के साथ मैकडी में बर्गर खा रही है ....जे छोरा कौन सा है उसने बुलवाओ..देखो जे फोटू |
प्रधानाचार्य: आप बैठिये शर्मा जी!....जाओ बेटा ज़रा अपने क्लास टीचर को और इस लडके को बुलाओ|
नीलू: यस सर!
(मिसेज गुलाटी और राहुल के साथ नीलू का प्रवेश )
गुलाटी: क्या हुआ सर!
प्रधानाचार्य: ये शर्मा जी ..
शर्मा: अरे ! मैडम ..जे देखो फोटू देख लो|
गुलाटी: तो क्या हुआ..?बर्गर खा रहे हैं ..इसमे क्या ?
शर्मा: ..कुछ भी न हुआ?..मैडम तुम म्हारे साथ ऐसे बर्गर खा सको हो ?
गुलाटी: चलो मगाओ ,हम सब के लिए सब एक साथ खायेंगे,..फोटो भी खिचवायेंगे|
शर्मा: जे सही लगा रहा है आपकू|
गुलाटी : साथ बैठ के बर्गर खा लिया तो क्या हो गया?..बेटा नीलू ,बाहर का खाना रोज रोज ठीक नहीं होता|
नीलू: यस मेम |
प्रधानाचार्य: साथ बैठ के खाने से ,हाथ मिलाने से,साथ आने जाने से लड़का लड़की में विश्वास बढ़ता है| एक दूसरे की सुरक्षा का भाव बनाता है|यही हमारे समाज की जरूरत है|
(सभी कलाकार एक दूसरे का हाथ पकड़कर झूमते हुए दो बार कहते हैं --साथ पढेंगे साथ बढ़ेंगे|)

@ भारतेंदु मिश्र

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

सहस्राब्दी स्मरण -अभिनवगुप्त की रसचर्या

प्रस्तुति #  भारतेंदु मिश्र


समय बीतता गया और भारतीय चेतना को साधारणीकरण व्यापार तथा रस की अभिव्यक्ति का  सिद्धांत देने वाले आचार्य को जन्मे एक सहस्र वर्ष हो गए| उनके कला विषयक सिद्धांतो के सकारात्मक  और समावेशी पक्ष –‘सत्यम शिवम् सुन्दरम’ की अविरल यात्रा को भी एक सहस्र वर्ष होने को आ गया |भारतीय कलास्वाद और रंग विश्लेषण की दृष्टि से भरत के उत्तराधिकारी के रूप में जिस चिन्तक की चर्चा गत सहस्र वर्षो में सर्वाधिक की गयी है उसका नाम आचार्य अभिनवगुप्त है| उनका वास्तविक नाम अभिनवगुप्तपाद है| उनके  नाम का  अभिप्राय समझने के लिए हमें अभिनव और गुप्तपाद दोनों शब्दों को अलग करके अर्थ समझना होगा | जो अभिनव है अर्थात जो नवीनतम है| दूसरा शब्द है गुप्तपाद अर्थात जिसके चरण गुप्त है, जिसकी गति में गोपन है| दाक्षिणात्य विद्वानों के अनुसार जो शेषनाग  का अवतार माना जाता है| जिस प्रकार शेषनाग के चरणों को किसी ने नहीं देखा लेकिन यह मान्यता है कि वे ही समूची पृथ्वी का भार अपने सहस्रफण पर उठाये हुए हैं | अभिनवगुप्त के चरणों (आयामों )की गति या प्रगति का अनुमान लगाना सहज नहीं है|तात्पर्य यह कि अभिनव अपनी मीमांसा से कला ,दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में कितनी गहराई तक हमारी चेतना को ले जाते हैं यह कहना संभव नहीं है|
जैसे ग्रीक चिंतन में अरस्तू (384 ई.पू.) अपने ही गुरु प्लेटो की आलोचना करके कला संबंधी नकार को सकार में बदलने की कोशिश  करते हैं और कालान्तर में समूचे योरोपीय जगत में उनके विचारों का आदर किया जाता है| उनके विरेचन के सिद्धांत को आज भी दुनिया भर के साहित्य जगत में आदर प्राप्त है| अरस्तू यह समझाने में सफल हुए कि नाटक द्वारा करुणा और दुःख के अनुभव से गुजरने के बाद भावक के मनोभावों का विरेचन हो जाता है और उसकी आत्मा प्रसन्न हो जाती है| अर्थात पाश्चात्य चिंतन में नाटक दुख को मांजने का साधन बना| जबकि भारतीय चेतना में खासकर अभिनवगुप्त के पदार्पण के बाद से  रस की अभिव्यक्ति और उसके आस्वाद की विस्तृत चर्चा हुई है| प्राचीन भारतीय रंगमंच पर दुखांत नाटको  की वैसी कल्पना नहीं की गयी जैसी ग्रीक थियेटर में रही है|    
यह संयोग ही है कि लगभग उसी प्रकार अभिनवगुप्त भी अपने नाट्यगुरु भट्टतौत की आलोचना करके अभिव्यक्ति वाद की स्थापना करते हैं | रस प्रसंग में साधारणीकरण की बात तो भट्टतौत ने  ही की थी  लेकिन अभिनवगुप्त साधारणीकरण की नई व्याख्या देते हैं और उसे अभिव्यक्तिवाद से जोड़ते हैं |  बहरहाल अभिनवगुप्त द्वारा की गयी रस सिद्धांत की व्याख्या तथा शैवमत के कैवल्य के सिद्धांत को उनका परवर्ती कोई अन्य विद्वान खंडित नहीं कर सका | काव्यप्रकाशकार मम्मट जैसे  आचार्य तो अपने मंगलाचरण में ही अभिनवगुप्त के रस सिद्धांत की नैसर्गिक विवेचना के लेकर उनकी प्रशस्ति करते है-
नियतिकृतनियमरहिताम आल्हादैकमयीमनन्यपरतंत्राम |
नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती कवेर्भारती जयति||     
अभिनवगुप्त के अनुयायी मम्मट के कहते है- कवियों की वाणी नैसर्गिक होती है,नियमो से आबद्ध नहीं रहती |वह नवरस  रुचिरा होने के कारण आल्हाद्मयी भी होती है ऐसी उस अनन्य स्वातंत्र्य देने वाली कवि परंपरा की जय हो| परमशिव के उपासक अभिनवगुप्त जैसा आलोचक टीकाकार भारतीय साहित्यशास्त्र और नाट्यशास्त्र में दूसरा नहीं हुआ| राम(सत्य) और रावण(माया ) दोनों को साध सकने की क्षमता भी शिव में ही निहित होती है| वे तांत्रिक भी है वे विरोधी तर्कों में भी सामंजस्य के बिंदु खोज लेते हैं| इसीलिए आचार्य मम्मट और आचार्य विश्वनाथ ने उन्हें अभिनवगुप्तपादाचार्य  की संज्ञा से विभूषित किया था| हिन्दी अभिनवभारती के व्याख्याता आचार्य विश्वेश्वर के अनुसार अभिनवगुप्त ने 41 ग्रंथो की रचना की परन्तु उनमे से केवल 11 ही प्रकाशित और विशेष चर्चित हो सके| प्रमुख रूप से उनके जिन ग्यारह ग्रंथो की रचना के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं वे क्रमश: इस प्रकार हैं –
1.बोधपंचदशिका,2.परात्रिंशिकाविवरण ,3.मालिनीविजयवार्तिक,4.तन्त्रालोक,5.तंत्रसार,6.तंत्रावटधानिका,7.ध्वन्यालोकलोचन 8.अभिनवभारती,9.भगवत्गीतार्थसंग्रह,10.परमार्थसार,11.ईश्वरप्रत्याभिज्ञाविमर्शिनी|
अभिनवगुप्त का जीवन परिचय भी उनके इन्ही ग्रंथो से मिलता है| वे अपने इन्ही ग्रंथो में अपने काल का भी उल्लेख करते चलते है|यद्यपि कश्मीर के इतिहास में उनके पूर्वजो का विस्तार से उल्लेख मिलता है| आचार्य विश्वेश्वर के अनुसार अभिनव का समय 950 ई. से 1025 ई.के बीच में माना जाना चाहिए| अभिनवगुप्त्पाद ने अपने ग्रंथो में ही अपने पूर्वजो और अपने गुरुओ का बड़े आदर से उल्लेख किया है| अभिनवगुप्त के पूर्वज अत्रिगुप्त अभिनव के जन्म से लगभग 200 वर्ष पूर्व कान्यकुब्ज (कन्नौज) से कश्मीर गए थे| हुआ ये कि काश्मीर के राजा ललितादित्य(725-761 ई.) ने कन्नौज के राजा यशोवर्मा(730-740 ई.) को युद्ध में पराजित किया और कन्नौज को कश्मीर में मिला लिया, फिर राजा ललितादित्य ही युद्ध के उपरांत अत्रिगुप्त जैसे प्रसिद्ध विद्वान को राजकीय सम्मान के साथ कान्यकुब्ज से कश्मीर ले गए| कश्मीर में उस समय अनेक दार्शनिक परंपराओं का शुभारंभ तब तक हो चुका था| बौद्ध ,मीमांसा,न्याय,शैव,सिद्ध ,सूफीमत  के अनुयायी पहले से ही विद्यमान थे| शंकराचार्य ने पीठ की स्थापना कर ही दी थी| अपने पूर्वजो के विस्थापन की सूचना देते हुए तन्त्रालोक में अभिनवगुप्त कहते हैं –
नि:शेषशास्त्रसदन किल मध्यदेश:
तस्मिन्नजायत गुणाभ्यधिको द्विजन्मा|
कोप्यत्रिगुप्त इति  नामनिरुक्तगोत्र:
शास्त्राब्धिचर्वणकलोद्यगस्तस्यगोत्र: |
तमथ ललितादित्यो राजा स्वकं पुरमानयत
प्रणयरभसात काश्मीराख्यं हिमालयमूर्धगम|| (तन्त्रालोक-27)
अर्थात अगस्त्य कुल में जन्मे मध्य देश के निवासी सकल शास्त्र के ज्ञाता द्विजकुल भूषण अत्रिगुप्त को शास्त्रों के ज्ञान रूपी समुद्र का आनंद लेने के लिए काश्मीर का  राजा ललितादित्य प्रेमपूर्वक अपने नगर को ले आया| उनका कुल ही कश्मीर में चुलुखक के नाम से विख्यात हुआ|  अत: अभिनवगुप्त के वंशज कन्नौज के निवासी थे|जो अभिनवगुप्त  के जन्म से 200 वर्ष पूर्व ही काश्मीर ले जाए गए थे| कल्हण कृत ‘राजतरंगिणी’ में भी इस सत्य के प्रमाण मिलते हैं| ये कान्यकुब्ज से कश्मीर जाने वाले अत्रि गुप्त ही इनके परबाबा थे | बाबा का नाम वराहगुप्त और पिता का नाम नृसिंह गुप्त और माता का नाम विमलकला था| इनकी माता का देहांत बाल्यकाल में ही हो गया था| अभिनव में विद्यार्जन की प्रबल उत्कंठा थी|अभिनवगुप्त अपने सात गुरुओ का उल्लेख भी करते हैं जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार है-
1.नृसिंह गुप्त (पिता,जिनसे व्याकरण सीखी )
2.वोमनाथ (द्वैताद्वैत –तंत्र के गुरु )
3.भूतिराजतनय (शैव संप्रदाय के गुरु )
4.लक्ष्मण गुप्त (प्रत्यभिज्ञा,क्रम तथा त्रिक दर्शन के गुरु )
5.इन्दुराज (ध्वनिसिद्धांत के गुरु )
6.भूतिराज (ब्रह्मविद्या के गुरु )
7.भट्टतौत (नाट्यशास्त्र के गुरु )
 इसके अतिरिक्त भी अन्य गुरुओ का बिना नामोल्लेख के स्मरण अभिनवगुप्त करते हैं | कहा जाता है  कि अभिनवगुप्त  योगिनीभूत पुत्र थे | उनकी बाल्यावस्था में ही माता का देहांत हो गया| पिता नृसिंह गुप्त  अपनी सुन्दरी पत्नी विमलकला के विछोह के दुख को सह न सके और जल्दी ही घर छोड़कर चले गए| मातृ पितृ विहीन बालक अभिनव अपनी सारी चपलता भूलकर दार्शनिक सिद्धान्तो और कलाओं के विवेचन आदि में अपना समय व्यतीत करने लगा | परिजन हीन बालक होने के नाते विवाह भी नहीं हुआ| धीरे धीरे अभिनव साहित्य से विमुख होकर शिव की कलाओं की ओर प्रवृत्त हो गए| यथार्थ जीवन में रसभोग का अवसर ही  नहीं था तो उन्होंने नाट्यशास्त्र,काव्यशास्त्र,शैव कलाओं आदि के रस का आस्वाद लेना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया | अभिनवगुप्त ने आजीवन ब्रह्मचर्य धारण करके भैरव गुफा में साधना की| कहा जाता है कि उनकी भैरव गुफा आज भी कश्मीर से गुलमर्ग जाने वाले मार्ग पर कही पायी जाती है| उस गाँव का नाम भैरव है|उसके समीप भैरवी नदी बहती है|वही पर यह भैरव गुफा भी है| इस गुफा में 40 से 50 व्यक्ति बैठकर एक साथ साधना कर सकते हैं| अब यह शोध का विषय है कि क्या ये वही गुफा है जिसमे अभिनवगुप्त्पाद साधना करते थे| लगभग 80 वर्ष की आयु पाकर उन्होंने इसी गुफा में अंतिम प्रयाण किया| बहरहाल उनकी साधना को प्रणाम करते हुए हम इतना अवश्य कह सकते हैं कि आचार्य अभिनवगुप्त के समय को लगभग एक हजार वर्ष व्यतीत हो चुके हैं |तथापि वे और उनके साहित्याशास्त्रीय सिद्धांत आज तक उतने ही प्रासंगिक बने हुए हैं| यह सिद्धि उनकी गहन साधना से ही संभव हुई होगी| इसके अतिरिक्त अभिनवगुप्त की कुछ कृतियाँ क्रमदर्शन और कुछ त्रिकदर्शन से भी संबंधित हैं|



एक और अभिनवगुप्त नामक आचार्य की चर्चा ‘शंकरदिग्विजय ’नामक ग्रन्थ में भी मिलती है| जो शाक्त परंपरा के थे और जिन्हें शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ में पराजित किया था| ये अभिनवगुप्त मूलत: असम प्रदेश के निवासी थे जो इन अभिनवभारती टीकाकार  अभिनवगुप्त्पादाचार्य से 200 वर्ष पहले हुए होंगे| वही शंकराचार्य का भी समय था| तात्पर्य यह कि अभिनवगुप्त्पाद को शंकराचार्य की दिग्विजय के प्रसंग से जोड़ना उचित नहीं लगता| ऐसा लगता है कि बाद के कुछ विद्वानों ने भ्रमवश अभिनवगुप्तपाद को 200 वर्ष पहले वाला अभिनवगुप्त समझ लिया| ’शंकरदिग्विजय’ के रचनाकार द्वारा दूसरे अभिनवगुप्त (असम वाले शाक्त परंपरा के अनुयायी अभिनवगुप्त की शंकराचार्य से पराजय )के उल्लेख से  उपजे भ्रम से  कालान्तर में ही ऐसा हुआ होगा |अत: यह भ्रम विद्वानों को नहीं बनाना चाहिए कि शंकराचार्य और अभिनवगुप्तपाद का समय एक ही है|
यहाँ हम जिन अभिनवगुप्तपाद की चर्चा कर रहे हैं वे अभिनवगुप्त हमारी नाट्यपरंपरा  साहित्य परंपरा के एक मात्र महान समालोचक हैं |वे जब शैवदर्शन की बात करते हैं तो स्वयमेव भारतीय कलाएं  ,भारतीय सौन्दर्य चेतना तथा भारतीय दार्शनिक परंपरा एकत्र होकर प्रकाशित और आभासित होने लगती है| असल में भारतीय कलाचेतना दार्शनिकबोध और साहित्यशास्त्र तथा नाट्यशास्त्र में एक आतंरिक साहचर्य का भाव सदैव विद्यमान रहता है| ये अलग अलग चिंतन धाराए होते हुए भी जीवन और जगत में एकरूप हैं |ये कलाए लोक से ही प्रेरित भी होती है और लोक सिद्धि में ही इनकी व्याप्ति भी होती है| भरत कहते है— ‘तस्माल्लोकप्रमाणम  हि ज्ञेयं नाट्यम’ अर्थात कला की साधना परमतत्व की साधना के समकक्ष है और इसे ही समष्टि की साधना के रूप में भी समझा जा सकता है| अग्निपुराणकार ने इसी लिए रस को ही ब्रह्म माना है-
            “रसो वै स: येन ही लब्ध्वानंदी भवति|” अर्थात वह रस ब्रह्म का ही पर्याय है| अर्थात रसवादी सृष्टि –कलाए-नाटक,संगीत,काव्य,वास्तु,स्थापत्य आदि परमानंद की साधना के अलग अलग मार्ग हैं | यही कारण है कि अभिनवगुप्त कलावादी होते हुए भी महान दार्शनिक प्रतीत होते हैं |अब ज़रा इस तर्क के आधार पर अभिनवगुप्त की कलाचेतना  सौन्दर्यचेतना और उनके साधारणीकरण व्यापार की व्याप्ति को परखिये कि लगभग एक सहस्र वर्षो से उनके साधारणीकरण व्यापार जैसा महत्वपूर्ण सिद्धांत अभीतक दूसरा नहीं बना सका|
तंत्र,काश्मीर शैवदर्शन,प्रत्यभिज्ञा दर्शन और स्वतंत्रकलाशास्त्र के वे ही सर्वप्रथम उद्गाता हैं | अभिनवगुप्त भारतीय कलाचेतना के सर्वप्रथम विश्लेषक होने के साथ ही दार्शनिक और कवि भी हैं | जब हम कलाचेतना की बात करते हैं तो उसमे समस्त ललित कलाओं का समावेश किए जाने की ओर हमारा लक्ष्य है| वस्तुत: यही भारतीय सौन्द्र्यान्वेशी चेतना का बीज रूप है|अनेक ललित कलाओ का सीधा संबंध शिव और पार्वती से है|अभिनवगुप्त भैरव गुफा में शिव तत्त्व की ही परम साधना करते है और वही बैठकर नाट्यशास्त्र की अभिनवभारती ,ध्वन्यालोक लोचन जैसी टीका के अलावा काश्मीर शैव,प्रत्यभिज्ञा ,त्रिक ,क्रम जैसे दार्शनिक मतों पर काम करते हैं |  उनके पास विवेचना के अनेक कोण हैं जिनसे वे दुरूह दार्शनिक सिद्धांतो को सहज स्वाभाविक और आधुनिक भाषा में कहे तो मनोवैज्ञानिक बनाने में सफल होते हैं | खासबात ये भी है कि उनका दर्शन और चिन्तन आस्तिक होते हुए भी  किसी कर्मकांड पूजा पद्धति परंपरा आदि पर केन्द्रित नहीं है| अर्थात उनका  साधारणीकरण व्यापार और उससे विक्सित हुआ अभिव्यक्तिवाद का सिद्धांत  काव्य,नाट्य ,संगीत,चित्र,वास्तु और स्थापत्य जैसे सभी ललित कला व्यापारों पर सामान रूप से लागू होता है | साधारणीकरण व्यापार की प्रक्रिया द्वारा ही कलाओं के माध्यम से मनुष्य के मन में स्थायीभाव के रूप में  सुसुप्त अवस्था में विद्यमान रस रूपी आनंद की अभिव्यक्ति होती है|
हालांकि मम्मट ,विश्वनाथ,पंडितराज जगन्नाथ जैसे परवर्ती आचार्यो ने उन्हें टीकाकार के रूप में ही सर्वाधिक मान्यता दी है| अभिनव तो गुप्तपाद  हैं उनके चरण कलाओं की कितनी गहराई  तक जाते है, विद्वानों को ले जाते हैं  और किस स्तर पर कलाओं और दार्शनिक सिधान्तो की व्याख्या करते हैं यह सर्वविदित है| ध्वनि सिद्धांत  की व्याख्या करते हुए अभिनवगुप्त सहृदय सामाजिक की जो परिभाषा प्रस्तुत करते हैं वह तो विलक्षण ही है ––येषां काव्यानुशीलनभ्यासवशादविशदीभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मयीभवन योग्यता ते स्वहृदयसंवादभाजा:  सहृदया:|(लोचन,ध्वन्यालोक 1/1पृ-39 )
अर्थात अभिनवगुप्त कहते है कि –‘सतत काव्य अनुशीलन के अभ्यास से जिनका मन रूपी दर्पण विस्तृत हो चुका है और जिनमे प्रसंगानुकूल वर्णन में तन्मय होने की पात्रता उत्पन्न हो गयी है और जो अपने ही ह्रदय की संवेदना के पात्र बन चुके है अर्थात तदानुभव की स्थिति में पहुँच गए है वे सहृदय हैं | ’
आज तक सहृदय की इतनी सटीक व्याख्या कही दूसरी जगह नहीं मिलती| यह सहृदय का लक्षण हम किसी भी कला के सहृदय के साथ जोड़ सकते हैं | तात्पर्य यह कि अभिनवगुप्त ने यह लक्षण ध्वनि की विवेचना करते समय काव्य के लिए दिया है,जो एक ललित कला का रूप है |अभिनव भारती में अनेक कलाओं और कलाव्यापारो का भावन करते समय जिन प्राश्निको की कल्पना की गयी है वे सब कला विश्लेषक ही है| उनसे भी इसी प्रकार की सहृदयता की अपेक्षा अवश्य रहती है| ये कोई सफल अभिनेता ही होता है जो राम रावण आदि के चरित्र को समाज में साधारणीकृत करने और उसका भावन कराने में सफल होता है| जितने मंच हैं -जितने समाज है- उतने राम है उतने साधारणीकरण के रूप हैं| उतनी ही अनंत छवियो वाला रसचर्या का आनंद लोक है| प्रत्येक अभिनेता की अभिव्यक्ति भंगिमा भी अलग है| सब भावक अपने आस्वाद के अनुरूप आह्लादित होते हैं | रसचर्या की प्रक्रिया एक जैसी है अभिव्यक्ति और आस्वाद की भंगिमाए अनंत है| यही भारतीय सौन्दर्य दृष्टि का सिद्धांत अभिनवगुप्तपाद  भरत के नाट्यशास्त्र  से लेकर व्याख्यायित करते हुए सर्वसाधारण सामाजिक सहृदय तक पहुंचाने का कार्य करते हैं | साधारणीकरण,वासना और संविद्विश्रान्ति को आचार्य बलदेव उपाध्याय ने अभिनवगुप्त की रसचर्या के तीन प्रमुख बिंदु स्वीकार करते हुए कहा है- ‘अभिनव की दृष्टि से साधारणीकरण  ललितकला के क्षेत्र में सामान्यरीत्या स्वत: नैसर्गिकरूपेण आविर्भूत होने वाला तत्त्व है|’(संस्कृत साहित्य का इतिहास-पृ.607)| भरत और अभिनवगुप्त की यह व्याख्या लोकहित में भी है लोकानुसारी भी है| जहां न कोई बड़ा है न छोटा है न सवर्ण है न दलित है |स्त्री, पुरुष या राजा, रंक का कोई भेद नहीं है| लोक के आलोक में निर्मित हुआ वह भरत और अभिनवगुप्त का सार्वजनिक रंगमंच है|     
       अभिनवगुप्त शिव के तांडव और गौरी के लास्य दोनों की एकसाथ साधना करने में दक्ष हैं |वे अर्धनारीश्वर के रूप में परमशिव तत्त्व और महामाया सहित 36 तत्वों की भी अविरल साधना करते हैं | उनका शैवमत एक और जहां सांख्य दर्शन के बहुत निकट है वहीं दूसरी ओर  शंकराचार्य के विशिष्टाद्वैत से पर्याप्त भिन्न है| वे लोकवादी है ,वे कलावादी है,वे समन्वयवादी है| आज एक सहस्र वर्ष बाद भी आचार्य अभिनवगुप्त के दार्शनिक सिद्धांत और कलाचेतना के सिद्धांत लगभग उसी प्रकार हमारी चेतना और हमारे मन को आप्लावित करते है जिस प्रकार वे अपने समय में करते थे| अभिनवभारती में उन्होंने रस चर्वण या रसचर्या के लिए लोक जीवन में सहज उपलब्ध जिस पानक रस का उल्लेख किया है वह आज भी पना(आम या इमली का पना) के रूप में जाना जाता है| इस पना में पाक कला के मूल  षडरस की व्यंजना सम्मिलित होती  हैं जिन्हें हम तिक्त ,मधुर ,कटु ,अम्ल,काषाय और लवण के रूप में जानते हैं| ये सभी भोजन के छः रस मिलकर पना के आस्वाद को विलक्षणता प्रदान करते हैं |यही कारण है कि पना का नाम स्मरण करते ही मुख में पानी आ जाता है| अभिनवगुप्त कहते है इसी तरह यह कलाओं का  आस्वाद  भी चर्वणा लभ्य है| इसे भी कलाकार विविध भावो विभावो अनुभावो और स्थायी आदि से पुंजीभूत करके सहृदय सामाजिक के लिए तैयार करते हैं | कला की ऐसी रसवादी सृष्टि किसी भी रूप में ब्रह्मानंद से कम नहीं हो सकती| कला माध्यम कोई  भी हो-  चाहे नाट्य हो,काव्य हो,संगीत हो,वास्तु हो या फिर चित्र आदि| कलाओं में संतुलन -संगति और लोकोंमुखता होने पर ही रस की अभिव्यक्ति निर्भर करती है| यह रस या आनंद की अभिव्यक्ति ही तो हमारे जीवन और जगत का मूल है| रस की अभिव्यक्ति केवल सहृदय सामाजिक को ही नहीं होती वरन नट/कवि/ संगीतकार और  कलाकार को भी सतत अनिवार्य रूप से होती है|     
ऐसे सौन्दर्य चेता दार्शनिक ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक शैवमत को ही नहीं विक्सित किया वरन पूरे विश्व में भारतीय सौदर्य दृष्टि को भी विकासित किया है|जिसकी विवेचना परंपरा मध्य काल की भारतीय कलाओं पर साफ़ तौर से देखी जा सकती है|  उसकी विवेचना आधुनिक समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है| मुझे लगता है कि हमारे उत्तर आधुनिक समाज में भी भारतीय कलाओं और भारतीय सौन्दर्य चेतना को समझने के लिए अभिनवगुप्तपाद को पढ़ना समझना आज भी आवश्यक है| ऐसे महान कवि  रंगविश्लेषक, चिन्तक शैव दार्शनिक आचार्य अभिनवगुप्तपाद की स्मृति को बारंबार नमन|   
संपर्क :
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फ़ो.-9899282621      


         

मंगलवार, 23 जून 2015


शास्त्रार्थ
वर्ष 2008 मे शंकराचार्य और मंडन मिश्र के ऐतिहासिक प्रसंग पर केन्द्रित नाटक -शास्त्रार्थ शीर्षक नाटक प्रकाशित हुआ था।कश्यप पब्लीकेशन- की शुरुआत इसी पुस्तक से हुई थी।इसी पुस्तक पर सेठ गोविन्ददास सम्मान भी 2009 मे मिला।इसका रेडियो द्वारा हिन्दी के अलावा-मराठी,गुजराती,बाग्ला,कन्नड,मलयालम,तमिल,उडिया सहित अनेक भारतीय भाषाओ मे अभिनय हुआ।आकाशवाणी के तत्कालीन(2009) उपनिदेशक रंगकर्मी दानिश इकबाल साहब ने इसका मंचन कराया था।अब पब्लिकेशन चल पडा है लेकिन पता नही कि शास्त्रार्थ की प्रतिया उनके पास है कि नहीं।मेरे पास सन्दर्भ हेतु एक दो प्रति ही बची है।कई मित्रो ने स्टेज करने की भी बात की किंतु ऐतिहासिक होने के नाते अभी तक बात बनी नही।