मंगलवार, 8 दिसंबर 2009



राष्ट्रीय संगोष्ठी:
नाट्यशास्त्रीय मौलिक तत्वो की विकास परम्परा (संगोष्ठी-रपट)

डाँ.हरि सिंह गौर वि.वि.सागर के संस्कृत विभाग द्वारा उक्त विषय पर दि.3-12-09से दि.5-12-09 तक एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
(दि.3-12-09)
उद्घाटन सत्र:
दीप प्रज्वलन के बाद भाई संजय द्विवेदी(शोध छात्र) द्वारा प्रस्तुत सुमधुर सरस्वती वन्दना से संगोष्ठी का शुभारम्भ हुआ। सागर वि.वि. संस्कृत विभाग की अध्यक्षा प्रो.कुसुम भूरिया ने विषय की सूक्ष्म प्रस्तावना रखते हुए अभ्यागतो का स्वागत किया। प्रो.के.एन.जोशी अध्यक्ष संस्कृत विभाग विक्रम वि.वि. उज्जैन ने इस अवसर पर नाट्यशास्त्र का परिचय दिया।
राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के उपकुलपति ,संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी ने इस अवसर पर बीज भाषण प्रस्तुत किया।विशेष बात यह रही कि प्रो. त्रिपाठी ने अपना वक्तव्य ओवरहेड प्रोजेक्टर तथा लेपटाप की सहायता से प्र्स्तुत किया। प्रो.त्रिपाठी सम्भवत:संस्कृत के पहले विद्वान है जो संस्कृत के क्षेत्र मे अधुनातन विज्ञान और तकनीकि का समुचित उपयोग करते हुए चलते है।इस अवसर पर प्रो.त्रिपाठी ने कहा-“नाट्यशास्त्र ऎसी विलक्षण पुस्तक है जो दुनिया मे अन्यत्र कही नही है।जैसे पाणिनि के समान विलक्षण दूसरा वैयाकरण दुनिया मे नही है।नाट्यशास्त्र और अष्टाध्यायी दोनो प्रयोग के शास्त्र है ,यहाँ हाँल मे बैठकर विवेचना की वस्तु नही है।जो चिंतन को प्रयोग से जोडता है वही मुनि है।अभिनवगुप्त के अनुसार भरत इसी आधार पर मुनि है।...नाट्यशास्त्र की परम्परा भरत से पहले भी हमारे देश मे रही होगी।भरत के अनुसार सात्विक अभिनय एक प्रकारसे परकाया प्रवेश विद्या की सिद्धि है-यथा देहांतरं गच्छन ..इत्यादि। कहा गया है –पश्य देवस्यकाव्यम न ममार न जीर्यते। नाट्यशास्त्र मे लोक है,वेद है और आध्यात्म है। नाट्यशास्त्र मे दर्शक चाक्षुष यज्ञ का प्रतिभागी है,बढई-माली-लुहार आदि सभी प्रतिभागी के रूप मे नाट्य प्रयोग का हिस्सा है।”
सत्र के अध्यक्ष सागर वि.वि के उपकुलपति प्रो.आर.एस.कसाना ने इस अवसर पर इस अध्यक्षीय भाषण मे प्रो.त्रिपाठी के साथ बिताये अपने अंतरंग क्षणो को याद किया तथा अभ्यागतो का इस संगोष्ठी मे स्वागत किया। अन्त मे प्रो.अच्युतानंद दाश के असमय निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उद्घाटन सत्र का समापन हुआ।
प्रथम सत्र
इस सत्र मे संगीत गुन्देचा –भोपाल,इला घोष –कटनी,रमाकांत पाण्डेय-जयपुर,सुमनलता श्रीवास्तव-जबलपुर,पूर्ण चन्द्र उपाध्याय-भवानी मंडी आदि ने अपने आलेख प्रस्तुत किये। सत्र की अध्यक्षता डाँ. भारत रत्न भार्गव-दिल्ली ने की। डाँ.भार्गव ने अपने अध्यक्षीय मे सभी आलेखो की समीक्षा प्रस्तुत की। संगीता गुन्देचा का मत्तवारणी,सुमनलता श्रीवास्तव का संगीत ,इलाघोष का अर्थप्रकृति,और रमाकांत पाण्डेय का राधावल्लभ त्रिपाठी की रसदृष्टि विषयक आलेख इस सत्र के विशेष आकर्षण रहे। सत्र का संचालन डाँ.महेश द्विवेदी (सागर)ने किया।
दि.4-12-09
द्वितीय सत्र
इस सत्र मे डाँ.मनसुख के. मौलिया-राजकोट,प्रो.कुसुम भूरिया-सागर,प्रो.ओ.पी.राजपाली-अम्बा,डाँ.पुष्पा झा-जबलपुर,डाँ.एम.एस.चम्पक लाल-बडौदा,गणेशानन्द श्रीवस्तव –जालौन आदि ने अपने आलेख प्रस्तुत किये।इस सत्र मे प्रो.कुसुम भूरिया का-नाट्यशास्त्र मे प्रजातंत्र,मनसुख मौलिया का -नाट्यशास्त्र मे छन्द विवेचन,ओ.पी.राजपाली का- संस्कृत नाटको मे प्रस्तावना,पुष्पा झा का-रासक उपरूपक की लोक धर्मी परम्परा,और चम्पक लाला का-आकाशवचन और जनांतिक विषयक आलेख बहुत चर्चित हुए।सत्र की अध्यक्षता प्रो.प्रभुनाथ द्विवेदी (वाराणसी)ने की और संचालन डाँ.पूर्णचन्द्र उपाध्याय-(भवानी मंडी) ने किया।
तृतीय सत्र
इस सत्र मे डाँ. प्रीति श्रीवास्तव –गुना,डाँ.भारतेन्दु मिश्र-दिल्ली,डाँ.भारत रत्न भार्गव-दिल्ली,डाँ.कमला प्रसाद पाण्डेय-बिलासपुर,ऋषन् भारद्वाज-सागर आदि ने अपने आलेख पढे।इस सत्र मे ,डाँ.भार्गव का-नाट्यशास्त्र की लोकवादी परम्परा,प्रीति श्रीवास्तव का-नाट्यशास्त्र मे स्वास्थ्य विधान,भारतेन्दु मिश्र का-भरत की सौन्दर्य दृष्टि, कमला प्रसाद का-नाट्यशास्त्र मे व्याकरण की विशेष रूप से सराहना की गयी। सत्र की अध्यक्षता प्रो.भागचन्द्र जैन भागेन्दु(-दमोह) ने और संचालन डाँ.शीतंशु त्रिपाठी-(सागर) ने किया।

विक्रमोर्वशीयम की मनोहारी प्रस्तुति (सायं:7 बजे)
प्रसिद्ध रंगनिर्देशक प्रो.कमल वशिष्ठ(ग्वालियर),सह निर्देशक-ब्रजेश रिछरिया के निर्देशन मे कालिदास कृत विक्रमोर्वशीयम नाटक का मंचन सागर वि.वि.के स्वर्णजयंती सभागार मे हुआ।नाटक की अवधि एक घण्टा पचास मिनट रही ।विदूषक -ब्रजेश रिछरिया ने पहले सूत्रधार फिर विदूषक के रूप मे जो समा बाँधा तो नाटक उठता चला गया ।सुन्दर दृश्यबन्धो के साथ शीतांशु त्रिपाठी-पुरुरवा, ब्रजेश रिछरिया –विदूषक,श्वेता केशरवानी-उर्वशी,शमीनाज खान-निपुणिका,स्वाती पाठक-मेनका,धर्मेन्द्र चौबे-आयुष राजेश राय-छत्र धारक आदि का अभिनय विशेष रूप से बहुत सराहा गया।
नेपथ्य मे रवि टाँक का -तबला,आर.के.माणके का -संगीत,संजय द्विवेदी और आस्था त्रिपाठी का गायन,मनीष बोहरे की सज्जा व्यवस्था,संगीत श्रीवास्तव की प्रकाश व्यवस्था,तथा सत्यवती त्रिपाठी की भूमिका संगीत संयोजन मे विशेष उल्लेखनीय रही।
दि.5-12-09
चतुर्थ सत्र (समापन सत्र)
वाराणसी से पधारे प्रो.शिवजी उपाध्याय-अध्यक्ष साहित्य विभाग स.स.वि.वि की अध्यक्षता मे इस सत्र का समापन हुआ। इस अवसर पर डाँ.भारत रत्न भार्गव ने विस्तार से इस संगोष्ठी के महत्व तथा भारतीय रंगमंच के ऎतिहासिक क्रम पर प्रकाश डाला। डाँ.पुष्पा दीक्षित ने नाट्यशास्त्र से जोडकर पुरुषार्थ चतुष्टय की चर्चा की। अंत मे प्रो.कुसुम भूरिया ने सभी अभ्यागतो के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया।

1 टिप्पणी:

  1. अच्छी जानकारी। सम्भव हो सके तो पढ़े गए लेखों को एक-एक कर देने का प्रयास करे।

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