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शनिवार, 27 जून 2020
शुक्रवार, 26 जून 2020
पुण्य स्मृति को नमन
भारतेंदु मिश्र
मुझे मेरे नाटक 'शास्त्रार्थ' की स्क्रिप्ट के लिए स्वयं फोन करके बधाई देने वाले महान रंगकर्मी और सहज मनुष्य पणिक्कर जी की पुण्यस्मृति को नमन |
आदरणीय प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी जी ने भोपाल में संस्कृत नाट्य महोत्सव का आयोजन किया था| भारत भवन भोपाल में अनेक महान रंगनिर्देशकों को सुनने चीन्हने का अवसर मिला|श्रद्धेय कावालम नारायण पणिक्कर जी से एक ही संवाद और तब एक ही मुलाक़ात हुई थी,उनके द्वारा निर्देशित शाकुंतल भी तभी देखा था|
अति उत्साहवश मैंने उन्हें हिन्दी में प्रकाशित 'शास्त्रार्थ' की प्रति भेंट की तो उन्होंने कहा -'मुझे हिन्दी में पढ़कर समझने में कठिनाई होती है|' दिल्ली लौटकर फिर मैंने उन्हें डॉ.प्रमोद कावलम द्वारा मलयालम भाषा में आनूदित स्क्रिप्ट की प्रति उनके पते पर भेज दी| ये प्रति मुझे आकाशवाणी के सौजन्य से मिली थी| इसके बाद उस बात को भूल गया क्योकि अक्सर बड़े लोग अपनी व्यस्तता में संवाद नही कर पाते| लगभग दो महीने बाद उनका फोन आया|तब मुझे पता लगा कि बड़े लोग सचमुच कैसे कितने बड़े होते हैं|देर तक उन्होंने नाटक के संवादों पर बात की|उसे नयी कथा के रूप में इसे मंचित कराने के लिए भी कहा| किन्तु वह सब संभव न हो सका| ऐसे ही हबीब तनवीर साहब से मिलने के दो तीन अवसर मिले किन्तु इन लोगों में मनुष्यता और इतनी सहजता देखने को मिली जो अन्यत्र दुर्लभ होती है| खासकर हिन्दी के तथाकथित महानों से यदि तुलना करें तो बहुत निराशा होती है| उनकी स्मृति को नमन |
आदरणीय प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी जी ने भोपाल में संस्कृत नाट्य महोत्सव का आयोजन किया था| भारत भवन भोपाल में अनेक महान रंगनिर्देशकों को सुनने चीन्हने का अवसर मिला|श्रद्धेय कावालम नारायण पणिक्कर जी से एक ही संवाद और तब एक ही मुलाक़ात हुई थी,उनके द्वारा निर्देशित शाकुंतल भी तभी देखा था|
अति उत्साहवश मैंने उन्हें हिन्दी में प्रकाशित 'शास्त्रार्थ' की प्रति भेंट की तो उन्होंने कहा -'मुझे हिन्दी में पढ़कर समझने में कठिनाई होती है|' दिल्ली लौटकर फिर मैंने उन्हें डॉ.प्रमोद कावलम द्वारा मलयालम भाषा में आनूदित स्क्रिप्ट की प्रति उनके पते पर भेज दी| ये प्रति मुझे आकाशवाणी के सौजन्य से मिली थी| इसके बाद उस बात को भूल गया क्योकि अक्सर बड़े लोग अपनी व्यस्तता में संवाद नही कर पाते| लगभग दो महीने बाद उनका फोन आया|तब मुझे पता लगा कि बड़े लोग सचमुच कैसे कितने बड़े होते हैं|देर तक उन्होंने नाटक के संवादों पर बात की|उसे नयी कथा के रूप में इसे मंचित कराने के लिए भी कहा| किन्तु वह सब संभव न हो सका| ऐसे ही हबीब तनवीर साहब से मिलने के दो तीन अवसर मिले किन्तु इन लोगों में मनुष्यता और इतनी सहजता देखने को मिली जो अन्यत्र दुर्लभ होती है| खासकर हिन्दी के तथाकथित महानों से यदि तुलना करें तो बहुत निराशा होती है| उनकी स्मृति को नमन |

शुक्रवार, 19 जून 2020
शनिवार, 13 जून 2020
चित्र :: संदीप राशिनकर |
कनबतियां @ भारतेंदु मिश्र
प्रोफेसर चैतन्य सिंह कनबतियां करने के शौक़ीन थे| मीटिंग से पहले कॉलेज प्रभारी प्राचार्य के कमरे में घुसकर उनके कान में कुछ कहा।
प्राचार्य मुस्कुराए सिर हिलाकर बोले " ठीक है... केवल दो ।"
बगल के हाल में मीटिंग शुरू होने को थी शिक्षकों की समस्याओं पर विचार होना था।शिक्षक प्राचार्य के सम्मान में उठ कर खड़े हुए
इसी बीच चैतन्य सिंह ने बैठे बैठे दो गालियां प्राचार्य को देते हुए कहा-"हरामी,...कमीने ..हमारी मांगें पूरी कर..."
बगल के हाल में मीटिंग शुरू होने को थी शिक्षकों की समस्याओं पर विचार होना था।शिक्षक प्राचार्य के सम्मान में उठ कर खड़े हुए
इसी बीच चैतन्य सिंह ने बैठे बैठे दो गालियां प्राचार्य को देते हुए कहा-"हरामी,...कमीने ..हमारी मांगें पूरी कर..."
दूसरे शिक्षक समझाने दौड़े, भाषा की ...मर्यादा की बात करने लगे।..
समझौते की मुद्रा बनी लेकिन असल मुद्दा खो गया। प्राचार्य ने चैतन्य सिंह को माफ कर महानता का परिचय देते हुए उन्हें गुलदस्ता भेंट किया।
सबने एक सुर से कामरेड चैतन्य जिंदाबाद कहकर उन्हें अपना नेता बना लिया। साथी शिक्षक टूटी कुर्सियों पर अपनी तशरीफ टिकाकर देर तक तालियाँ बजाते रहे|
संपर्क :
9868031384
समझौते की मुद्रा बनी लेकिन असल मुद्दा खो गया। प्राचार्य ने चैतन्य सिंह को माफ कर महानता का परिचय देते हुए उन्हें गुलदस्ता भेंट किया।
सबने एक सुर से कामरेड चैतन्य जिंदाबाद कहकर उन्हें अपना नेता बना लिया। साथी शिक्षक टूटी कुर्सियों पर अपनी तशरीफ टिकाकर देर तक तालियाँ बजाते रहे|
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