शनिवार, 14 मार्च 2015


वर्ष-2004 मे प्रकाशित यह पुस्तक -मेरे लगभग एक दशक के शोध का परिणाम है,अब कई वर्षो से ये पुस्तक भी आउट आफ प्रिंट हो चुकी है।अब तो प्रकाशको की खोज कर रहा हूं,जिनकी रुचि हो ऐसी किताब छापने में हो ताकि इस विषय के प्रेमी मित्रो/शोधार्थियों आदि को यह पुस्तक पढने को मिल सके।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015



तीन एकांकी

दिल्ली चलो,लडकी की जात और मरे हुए लोग। 2003 मे प्रकाशित हुए ये तीनो नाटक भी अब आउट आफ प्रिंट हो चुके हैं।इन नाटको मे से पहला दिल्ली चलो(सुभाष च्न्द्र बोस जी की जन्मशती ) पर साहित्य कला परिषद दिल्ली द्वारा 1997मे पुरस्कार भी मिला था। लडकी की जात(बालिका शिक्षा पर केन्द्रित) का मंचन हमारे विद्यार्थियो द्वारा ही नही अनेक मंचो से किया गया।मरे हुए लोग (उ.प्र.के किसानो को मरा हुआ दिखाकर उनकी जमीन हडपने की साजिश पर केन्द्रित है)का मंचन भी अनेक स्तरो पर हुआ रेडियो से भी भाई दानिश इकबाल के निर्देशन मे इसका मंचन हुआ।मित्रो के लिए /प्रकाशक बन्धुओ के लिए सूचनार्थ।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

स्वानुभूति से सह-अनुभूति तक / अशोक गुजराती


खिड़की वाली सीट—समीक्षा-2
जैसा कि लेखक ने स्वयं प्राक्कथन में उल्लेख किया है .इस संग्रह में समाहित कहानियों में उनका अध्यापक ,पर्यवेक्षक और समन्वयक का व्यक्तित्व उभर आया है|सच है कि हम वही तो लिखेंगे, जो हमारे इर्द–गिर्द की स्थितियाँ और तमाम लोग हमें अनुभव प्रदान करेंगे| शेर मुंह वाले मास्टर साहब, क्लास और क्लास, नेक इरादा, सन्नाटा, और कलमुंही जैसी कहानियां उनके स्वयं–अनुभूत सत्य से सृजित हुई प्रतीत होती हैं| इससे हुआ यह कि ये सारी कथाएँ वायवी ना होकर यथार्थ के करीब से होकर गुजरती हैं| दूसरी विशेषता भारतेंदु जी की मैं रेखांकित करना चाहता हूँ, जो शायद उन्हें खुद भी अहसास न करा पायी हो, वह है उनके संवादों की लय, वस्तुस्थिति से अभिन्नता और दृश्य को सामने रखकर उसमें रच बस जाने की कला। जी हाँ, यह निश्चित ही प्रदर्शित करता है कि लेखक कहानियों से अधिक सक्षम नाटकों की सर्जना करने में प्रवीण है| उनके नाटक पुरस्कृत भी हुए हैं, मैं उनसे उस क्षेत्र में और–और कार्य करने की अपेक्षा करता हूँ| इस किताब में संग्रहीत उनकी एक कहानी है--‘घेरे और घेरे’| इस कहानी में वे प्रेम विवाह और संयोजित विवाह की तुलना बहुत गहराई से करते हैं| इन दिनों अंतरजातीय विवाह और जल्द ही किसी-न-किसी कारण से तलाक की घटनाओं में जो इजाफा हो रहा है, इसका असर लडकी के माँ-बाप के अंतर्मन को झकझोर देता है और पुरानी पीढी के परंपरावादी बुजुर्ग इसको सह नहीं पाते| क्या इस अनिष्ट की चिंता आजकल का युवा वर्ग अपनी सोच का हिस्सा भी बनाता है? इस कहानी में उनका एक बहुत सटीक उद्वेलन भी है-–‘औरत तो रसीदी टिकट होती है| उस पर एक बार किसी के हस्ताक्षर हो जाएं तो उसका महत्त्व शून्य हो जाता है..’ वे दाम्पत्य प्रेम का विश्लेषण करते हुए कहते हैं-‘वस्तुत: प्रेम परस्पर पलता है| रोज की खटर-पटर में ज्यों ज्यों उम्र पकती है–प्रेम प्रगाढ़ होता जाता है|’ ‘क्लास और क्लास’ में वे एक रईस परिवार का कच्चा चिट्ठा खोलते हैं| पति अमेरिका जाकर भोग-विलास में मस्त है तो पत्नी अपने बच्चे के टीचर से दैहिक आनंद लेने में रत है| मुझे इस कहानी में पत्नी उतनी अधिक दोषी नहीं लगती जो बराबरी के स्तर पर जीने की जिद के अलावा अपनी शारीरिक आवश्यकता की मांग को खोलकर स्वीकार करती है| ‘उस्ताद जी’ एक बढ़िया कहानी है जिसमें फ़ौज से निवृत्त हुए हज्जाम की सक्रियता, रुआब और अहमन्यता को लेखक ने बिलकुल सहज तरीके से उजागर किया है| ‘कलमुंही’ की विद्या, ‘बीजगणित’ के मिस्टर एक्स, ‘काक्रोचों की दुनिया’ के जेडी, ‘खिड़की वाली सीट’ के उच्च्वार्गीय महाशय, ‘बरतौनी’ के ठाकुर गयाबख्श व रामप्रसाद-–इस प्रकार के चरित्र समाज में अक्सर दिखाई दे जाते हैं ये अपने आप में कुंठित, चरित्रहीन तथा पराजित व्यक्ति होते हैं जो दूसरो की तकलीफों की फ़िक्र से अनजान पतन की राह पर चल पड़ते हैं| इसके विपरीत ‘नेक इरादा’ के खयाली राम मास्टर हों अथवा शेर मुँह वाले मास्टर साहब-–यह साबित करते हैं कि इस दुनिया में सामंजस्य भाई चारा विश्वास सह-अनुभूति और अपनेपना के जज्बे का अस्तित्व अभी भी बना हुआ है, और इसी प्रेम भावना के कारण यह विश्व सुचारु रूप से गतिमान है| अंत में भारतेंदु जी की कहानी कहने की सरल सुबोध एवं सुगम विशेषता उनकी किस्सागोई को लोककथा के अंदाज में परिवर्तित कर पाठक को लुभाती है निरंतर बांधे रहती है| दो दशकों की दीर्घ समायावधि में लिखी-छपी इन कहानियों में काल के सतत बदलाव को जहां लक्ष्य किया जा सकता है वहीं उनकी गति में वृद्धि होकर भविष्य में और श्रेष्ठ कहानियों की अपेक्षा जगाता है| (आलोच्य पुस्तक:खिड़की वाली सीट, लेखक:डा.भारतेंदु मिश्र, प्रकाशक :वागदेवी प्रकाशन,गाजियाबाद, मूल्य:रु॰ 150/-,वर्ष:2013) सम्पर्क: प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी 40 / एफ 1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली-110095 सचल-09971744164 / फोन : 8010531187

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

जनजीवन के भावांकन व साधारणीकरण की कहानियां / संतोष कुमार सिंह


खिड़की वाली सीट : समीक्षा-1
रस शास्त्र कविता के साधारणीकरण को साहित्य का लक्ष्य घोषित करता है |कहना होगा कि भारतेंदु मिश्र की कहानियों का यह संग्रह अपनी सुघड़ता ,सहजता,और ग्राह्ता में साधारणीकरण के स्तर तक उठता है|यथार्थवादी एवं रोमांटिक शैली में लिखी गयी ये कहानियां एक शिक्षक के इर्द गिर्द फैले जनजीवन का भावांकन करने में सफल हुई हैं| कला एवं व्यवसाय के प्रति समर्पित ‘उस्ताद जी’ जहां भारतीय समाज के समन्वयवादी अवधारणा के मूर्तिमान हैं, वहीं कलीमुद्दीन जैसे नवधनाड्य के प्रति उस्ताद जी की प्रतिक्रिया एक अनुशासित फ़ौजी की सहज प्रतिक्रिया ही कही जानी चाहिए| ‘कलमुहीं’ कहानी पैसे और देह की साधना में रमे समाज के पतनशील चरित्र को उजागर करती है|इन कलमुहों को दूसरे की जायदाद या अन्य कुछ भी हड़पने के लिए स्त्री के विकृत चरित्र का इस्तेमाल ही क्यों न करना पड़े इन्हें अपनी हवस साधने के लिए हर कीमत छोटी लगती है| ‘शेरमुँह वाले मास्टर जी ’मेहनत लगन एवं निष्ठा से समाज (उनका डाक्टर बेटा भी इसी मुहिम का हिस्सा है ) के चेहरे को उन्नत करने में लगे हैं, मानो लेखक के मन में विद्यमान अध्यापक अपने अध्यवसाय एवं स्वाभिमान रूपी दो कंधों से समाज का पथ प्रदर्शन करने में अग्रसर है|यह कड़ियल अध्यापक लालसा एवं वैभव की दौड़ में शामिल नमकहराम अपने डाक्टर बेटे को किसी भी सूरत में माफ़ करने को तैयार नहीं है| काक्रोचो की दुनिया,बरतौनी,सन्नाटा आदि क्रमश: घटना वक्रता एवं घटना बहुलता से साधी गयी कहानियां हैं|ये कहानियां अवसरवाद ,नवसामंतो /उच्च अधिकारियों के मन में पलती स्त्री-देह लोलुपता को अपने ढंग से व्यक्त करती है|जबकि दो अलग अलग शैलियों में लिखी गयी ‘घेरे और घेरे ’एवं ‘परती जमीन’ कहानियां इस संग्रह की महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं| ‘घेरे और घेरे ’कहानी स्त्री विमर्श के नारे को उसके ठोस सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अंकित करती है|इस कहानी के दो प्रमुख पात्रो में से जहां सुनीता अपनी शर्तो पर जीवन जीने –जीवन साथी चुनने ,व्यवसाय चुनने एवं वैचारिक स्वाधीनता जैसे आधुनिक विचार को लेकर प्रतिबद्ध है|वहीं प्रियंक रूमानी ज्वार के उतर जाने के बाद अपनी खोल में उतर आने वाला नौजवान है | सुनीता की वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट है |उसका आत्मविश्वास स्वाभिमान बिलकुल आधुनिक स्त्री के तेवर को रूपायित करता है|वहीं प्रियंक का चरित्र कथित परिवार की परंपरा प्रतिष्ठा के समक्ष स्खलित हो जाता है और उसमे शायद सामान्य मानवीय सौजन्य तक की मर्यादा का अभाव दिखता है|जहां तक लेखक के वैचारिक तेवर का ताल्लुक है उसने अपनी वैचारिक तटस्थता को कॉफ़ी हद तक साधा है,हाँ एकाध टिप्पणी से सावधानी पूर्वक बचा जाना चाहिए था वो चाहे अपनी पीढी की सापेक्षिक प्रंशसा(पृष्ठ -४३ ) हो या सुनीता को कोसना (पृष्ठ -४५ )|कहानी की विशिष्टता उसके छोटे छोटे सटीक संवादों से बढ़ जाती है|भारतेंदु मिश्र अपनी तरफ से जो भी टिप्पणी करते जाते हैं उससे बच लेना उचित होता- क्योकि पाठक उसे पक्षपात की तरह देखते हैं | भावुकता का साहित्य से वही रिश्ता है जो पानी का प्यास बुझाने से| ‘परती जमीन ’तमाम जाने पहचाने फार्मूलो के बावजूद पानी और प्यास के रिश्ते की कथा है |निजी तौर पर मुझे इन भावुकतापूर्ण कहानियों ने किसी भी दूसरी शैली की कहानियों से अधिक संतोष दिया है|प्रेमचन्द साहित्यकार को पथप्रदर्शक का दर्जा देते हैं |ऐसी कहानियों का स्वागत होना चाहिए जो मजहब और फिरको की कट्टरता को शिथिल कर समन्वय का पथ प्रदर्शित करती हैं | कुल मिलाकर भारतेंदु मिश्र की साधारणीकरण की शैली का स्वागत किया जाना चाहिए|हाँ इस साधारणीकरण को कहानी के मूल उद्देश्य संवेग,संवेदना,तनाव और व्यंग्य के आवेग को तीक्ष्णता देने वाला अवश्य होना चाहिए| (आलोच्य पुस्तक:खिड़की वाली सीट ,लेखक:डा.भारतेंदु मिश्र ,प्रकाशक :वागदेवी प्रकाशन,गाजियाबाद ,मूल्य:१५०,वर्ष:२०१३/) (कथादेश के फरवरी-१४ अंक में प्रकाशित) संपर्क:बी-१२/एफ-३ डी.एल.एफ.दिलशाद एक्स्टेंशन-२,गाजियाबाद-२०१००५

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

चार रंग और चार दिन ,रस रंग सने


चार रंग का समापन
हिन्दी अकादमी द्वारा चार रंग शीर्षक से चार दिन –चार निर्देशकों की तेरह कहानियों का मंचन किया गया |निर्देशकों के नाम क्रमश:- देवेन्द्र राज अंकुर,श्रीमती त्रिपुरारी शर्मा,एम.के.रैना और बंशी कौल थे| समापन वाले दिन यानी १-८-१३ को बंशी कौल निर्देशित जिन दो कहानियों का मंचन किया गया –वे थीं – डिप्टी कलेक्टरी और जिन्दगी और जोंक ये दोनों अमरकान्त जी की कहानियां और उनका मंचन बेहद मार्मिक रहा|चारो दिन कथा रस और द्रश्यबंधो का अनूठा संगम बना रहा दिल्ली के रंग प्रेमियों के लिए |

सोमवार, 13 जून 2011

दृश्यबन्ध -3

(सावित्री अष्टावक्र को भक्त प्रहलाद की कथा सुनाती है ।भक्त प्रहलाद की रोचक कथा सुनकर अष्टावक्र अपनी माता से प्रहलाद और नृसिंह भगवान के बारे तरह तरह के सवाल पूछता है।)

अष्टावक्र:माँ भगवान नृसिंह कैसे चलते थे?..मनुष्य जैसे या सिंह जैसे?

सावित्री :भोन्दूराम,यह तो कहानी है,कहानी से सीख ली जाती है।

मैने भगवान नृसिंह को ठोडे ही देखा है। तू ये समझ ले कि जीवन के लिए चलना अनिवार्य है-बस।

अष्टावक्र:आप चिंता न करें माँ! मै अपना रास्ता स्वयं बनाऊगा।

सावित्री :ऐसा ही हो मेरे लाल।

(सुमित्रा बाल विधवा थी।पति के देहांत के बाद ससुराल वालों ने और मायके मे भाइयों ने भी थोडे दिन शरण देने के बाद तिरस्कृत कर दिया था। अब उसे दोनो परिवार के लोगों ने मनहूस कहकर घर से बाहर कर दिया था।..परिजनो से उपेक्षित सुमित्रा को एक दिन सावित्री मिल गयी थी और वह उसे विद्यापीठ में ले आयी थी।धीरे धीरे आचार्य सुयश ने भी सुमित्रा को और सुमित्रा ने विद्यापीठ को अपना लिया। अब सुमित्रा अष्टावक्र की बुआ बन गयी थी )

(सावित्री अब अस्वस्थ रहने लगी थी।उसकी खाँसी क्षय रोग बन चुकी थी। एक दिन-)

सुमित्रा:भाभी,मुझ जैसी मनहूस को आप इस विद्यापीठ मे क्यों ले आयीं?..कहीं मेरे पापों की छाया आपके सुपुत्र पर न पड जाये?

सावित्री:..तू निरी मूर्ख है...अरे मनहूस तो वो था जो मर गया और तुझे विधवा बना गया..देख मेरा स्वास्थ्य ठीक नही रहता...अब तुझे ही विद्यापीठ की देखभाल करनी है।

सुमित्रा:आपको कुछ नही होगा..

सावित्री:..कुछ पता नही यह खाँसी बढ गयी है...मन उचट गया है...बस तुझे अपना समझकर कहती हूँ -कि यह विद्यापीठ कभी न छोडना। मै न रहूँ... तो मेरे भोन्दूराम का ध्यान रखना।

सुमित्रा:..बस कीजिए...भाभी..मुझे रोना आ रहा है...

सावित्री: तू बहुत रो चुकी है,अपनी छोटी सी उम्र में..अब समझदारी से काम ले।

सुमित्रा:मै कुछ नही समझ पा रही हूँ...

सावित्री:सुन..(खाँसते हुए) देख, मेरी हालत ठीक नही है.. (फिर खाँसते हुए) अब तुझे ही विद्यापीठ का सारा दायित्व निभाना है।..

सुमित्रा:मैं..कैसे?

सावित्री: हाँ तू तुझे ही सभी वटुकों का ध्यान रखना होगा..

सुमित्रा: जी,भाभी..

सावित्री:देख विद्यापीठ मे बहुत काम होता है।अब मेरे बस का नही रहा। गोशाला है -उद्यान है,यहाँ तरह तरह के वटुक आते हैं-उनका भोजन बनाना होता है,सबको अपने हृदय की ममता से सींचना होता है और अनुशासन की आँख से नियंत्रित करना होता है।

सुमित्रा:इतना सारा दायित्व..?..मैने...कभी...

सावित्री: नही निभाया तो क्या तू सक्षम है..यह तेरा नया जीवन है।जैसे जैसे नये जीवन मे प्रवेश करेगी वैसे ही अपना अंनर्थकारी अतीत भूलेगी।...बस तू संकल्प कर ले।

सुमित्रा:कैसे होगा यह सब?...

सावित्री;तू जानती नही नारी के अंग अंग में प्रेम की अमृतधारा समायी रहती है..बस किसी को स्पर्श से -किसी को पुचकार से -किसी को विनम्र होकर -किसी समर्पण से और किसी किसी को तो देखकर ही अपने वश मे कर लेती है।

सुमित्रा:मैं...यह सब...

सावित्री:हाँ सुमित्रा,तू सुंदरी है..तू निष्पाप है..तू सबको अपने वश मे कर सकती है।..यहाँ गायें हैं-वटुक हैं-पक्षी हैं-वृक्ष हैं ,आचार्य सुयश जैसे विद्वान गुरु हैं..तू प्रकृति रूपा है सँभाल ले यह विद्यापीठ का साम्राज्य।

(सुमित्रा की खाँसी तेज हो जाती है।)

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011



अष्टावक्र


(लोकविख्यात बालयोगी अष्टावक्र के जीवन पर केन्द्रित नाटक)

दृश्यबन्ध-दो

(अष्टावक्र का घर ही विद्यापीठ था तो लगातार नए वटुक आते रहते थे। ये वटुक सिर मुडा कर एक लँगोटी,एक धोती,एक जनेऊ लेकर आते थे। इनका उपनयन संस्कार होता था। और फिर माता भिक्षां देहि कहते हुए उन्हे आचार्य विद्यापीठ मे ले आते थे। धोती आचार्य के लिए,लँगोटी अपने लिए जो धोती नही दे पाते थे वे अँगौछा या उत्तरीय ही ले आते थे। अनाज फल गुड आदि की व्यवस्था अभिभावक ही करते थे। सर्दियों के लिए काली कमली भी वटुक अपने घर से ही लाते थे। आचार्य सुयश शर्मा वेदविद्या के खासकर कर्मकाण्ड के आचार्य थे। ज्यादातर विद्यार्थी पुरोहिताई सीखने आते थे। वटुको की संख्या दस से अधिक थी।गायो की सेवा,गोदोहन,उपले थापने आदि का दैनिक कार्य वटुको का ही था।आचार्य जी ने दिन के हिसाब से सभी वटुको को कार्य सौप रखा था।उपनयन करवाने के बाद जो भी वटुक वहाँ आता वह सबके साथ अपनी कुटिया बनाकर रहता। सभी वटुको का भोजन आदि सावित्री और सुमित्रा ही बनाती थी।–सावित्री अस्वस्थ थी,अब उसकी एक ही चिंता थी कि अष्टावक्र स्वावलम्बी कैसे बने। एक दिन साँझ को सुलाते समय सावित्री ने बेटे के सिर पर हाँथ फिराते हुए कहा-)

सावित्री:-बेटा अब तू बडा हो गया है,अपने आप शौच आदि जाया कर।अपने आप नहाया कर और लँगोटी धोने की आदत भी डाल ले।

अष्टावक्र:-क्यों,माँ?...अपने आप क्यो?

सावित्री:-बेटा कुछ कार्य संसार मे अपने आप ही करने होते हैं,सभी वटुक करते हैं न?..पहले तुझे कठिनाई होगी लेकिन अभ्यास करेगा तो स्वावलम्बी बन सकेगा।

अष्टावक्र:- मैं... सामान्य नही हूँ..आप तो जानती हैं—वैसे आप कहीं जाने वाली हैं ?

सावित्री:-हाँ बेटा मेरी तबियत ठीक नही रहती,पता नही कब साँस रुक जाये....सुमित्रा बुआ भी यह सब नही करेंगी.....तू सामान्य नही, तू तो विशेष है-मेरा लाल,फिर अब तू बडा हो आया है।

अष्टावक्र:-अभी आपको सौ साल तक जीवित रहना है..माँ...

सावित्री:-(मुस्करायीऔर गहरी साँस लेकर बोली) चल ठीक है,बातें न बना।कल से अपने काम स्वयं करने का प्रण कर।

अष्टावक्र:-हाँ मै प्रण लेता हूँ.....।–मै अष्टावक्र ,अपनी माता के समक्ष प्रण लेता हूँ कि कल से अपने सभी दैनिक कार्य स्वयं करूँगा..अब तो ठीक है माँ।

सावित्री:- (सावित्री की आँखे भर आयीं).. ठीक है। लेकिन ध्यान रहे ..कठिनाई से डर मत जाना।

अष्टावक्र:-बस आप देखना माँ।

(दूसरे दिन सुबह से ही अष्टावक्र ने अपने दैनिक कार्य करने शुरू किये तो सचमुच उसे बहुत कष्ट हुआ। उस की सबसे बडी समस्या चलने की थी।चलने के नाम पर वह हाँथों और पैरो के बल घिसटता था। पहले दिन उसे बिना किसी की सहायता के काम करने मे दोगुना समय भी लगा। किंतु माता के सामने लिया प्रण उसने निभाया। )

सावित्री:- ( आँचल मे मुँह छिपाकर)-कितना कष्ट हो रहा है मेरे लाल को ,हे दैव,क्या करूँ...अरे इसके तो घुटने छिल गये हैं...खून भी बह आया है..इसकी मदत करनी चाहिए ...मैने निरर्थक ही प्रण दिलाया..मै भी इतनी कठोर हूँ?

सुमित्रा:-दीदी..क्यो रो रही हो ,मै इसकी मदत करती हूँ ...

सावित्री:- नही सुमित्रा!..इसकी आवश्यकता नही है। यह इसकी पहली परीक्षा है। मुझे देखने दो कि यह अपना प्रण निभा पायेगा कि नही?

सुमित्रा:- दीदी इसे बहुत कष्ट हो रहा है,

सावित्री :- मै देख रही हूँ, लेकिन मेरा लाल हारेगा नही ऐसा मेरा विश्वास है।

सुमित्रा:- आप ठीक कहतीं हैं दीदी...लेकिन मुझसे भी देखा नही जा रहा..

सावित्री:-बस अब रोज देखना,धीरे-धीरे वह अपने काम स्वयं करेगा।

(अष्टावक्र ने शौचादिक से निवृत्त होकर आज स्वयं स्नान भी किया था। पिता ने भी यह देखा लेकिन उन्हे इसकी कोई प्रसन्नता न हुई। वे बिना कुछ बोले ही अपने काम मे व्यस्त हो गये। सावित्री के लिए यह बडी घटना थी। अष्टावक्र के छिले हुए घुटनो और कुहनियो से अभी खून बह रहा था। )

सावित्री:- कहो मेरे लाल?...बहुत पीडा होगी?

अष्टावक्र:- (अष्टावक्र के आँसू निकल आये थे,लेकिन वह मन से तो वह सबल हुआ था,बोला) हाँ माँ पीडा तो है..किंतु आज मै विजेता बन गया हूँ...मैने अपना प्रण निभाया..

सावित्री:- (आँचल से पुत्र की आँखे पोछते हुए) सचमुच मेरे लाल!..तुम आज विजेता बन गये हो जीवन की पहली परीक्षा मे सफल हो गये।..मै बहुत प्रसन्न हूँ,..सुमित्रा!अरे जल्दी से मेरे लाल के घावो पर औषधि लेप करो।..रहने दो लाओ मै ही करती हूँ।

(सावित्री देर तक पुत्र के घावो को साफ करके उनपर इंगुदी के तेल की मालिश करती रही। फिर पुत्र का मुँह चूम कर बोली)

सावित्री:- देखो भोंदूराम,तुम सामान्य बालक नही हो,तुम तो परमात्मा के विशेष दूत हो-इसी लिए तुम सबसे अलग हो...

अष्टावक्र:- दूत क्या करता है माँ?

सावित्री:- परमात्मा का दूत सच्चा मनुष्य होता है,वह दुनिया भर को सही रास्ता दिखाता है।

अष्टावक्र:क्या दूत के हाथ पैर मेरे जैसे ही होते हैं?

सावित्री:हाँ ..ऐसे भी होते हैं,वैसे भी होते हैं...

अष्टावक्र:ऐसे भी और वैसे भी का क्या अर्थ है माँ?

सावित्री:तनिक बडा होगा तो स्वयं समझ जायेगा। अब चुप रह औषधि लेप करने दे।

सुमित्रा:-दीदी,आपका प्रयोग सफल रहा।

सावित्री:-तुम तो जानती हो मेरी तबियत कुछ ठीक नही रहती। वैद्य जी ने कहा है –कि खाँसी ठीक नही हुई तो अंतिम समय दूर नही..

सुमित्रा:-आप ऐसा क्यो सोचती है

सावित्री:-सुनो मेरी बात,अष्टावक्र मे मेरे प्राण बसते हैं..मुझे यदि कुछ हो जाये तो मेरे बाद तुम्हे ही इसका ध्यान रखना होगा..मुझे वचन दो

सुमित्रा:-आपको कुछ नही होगा दीदी!,बस अभी ज्यादा मत बोलिए-खाँसी बढ जायेगी।...मेरी ओर से आप निश्चिंत रहें-जैसा कहेगी वैसा ही होगा।

अष्टावक्र:-माँ वो प्रहलाद वाली कहानी सुनायी थी आपने...

सावित्री:-हाँ वो तो पूरी हो गयी थी।

अष्टावक्र:-किंतु माँ नरसिंह भगवान का आधा शरीर पशु जैसा था और आधा मनुष्य जैसा फिर वो चलते कैसे थे-यह तो आपने नही बताया?

सावित्री:-वो सब तरह चल सकते है। मनुष्य की तरह भी और पशु की तरह भी..

अष्टावक्र:-मेरे जैसे भी?..मै तो पशुओ की तरह चल पाता हूँ...

सावित्री:-हाँ,तो क्या हुआ ...(आँसू पोछते हुए) बस जीवन के लिए चलना आवश्यक है मेरे भोन्दूराम। बस ये सोचो कि तुम्हे चलते रहना है।

(अष्टावक्र नरसिंह भगवान के शरीर और अपने शरीर मे तमाम समानताएँ खोजने लगा। वह यो ही आत्ममंथन करता रहा।)